मुस्लिम समाज में तालीम की बयार

फ़िरदौस ख़ान फ़िरदौस ख़ान शिक्षा सभ्य समाज की बुनियाद है. इतिहास गवाह है कि शिक्षित क़ौमों ने हमेशा तरक़्क़ी की है. किसी भी व्यक्ति ...

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

शिक्षा सभ्य समाज की बुनियाद है. इतिहास गवाह है कि शिक्षित क़ौमों ने हमेशा तरक़्क़ी की है. किसी भी व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए शिक्षा बेहद ज़रूरी है. अफ़सोस की बात यह है कि जहां विभिन्न समुदाय शिक्षा को विशेष महत्व दे रहे हैं, वहीं मुस्लिम समाज इस मामले में आज भी बेहद पिछड़ा हुआ है. भारत में ख़ासकर मुस्लिम महिलाओं की हालत बेहद बदतर है. सच्चर समिति की रिपोर्ट के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं कि अन्य समुदायों के मुक़ाबले मुस्लिम महिलाएं सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से ख़ासी पिछड़ी हैं, लेकिन ख़ास बात यह है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद वे विभिन्न क्षेत्रों में ख्याति अर्जित कर रही हैं.

सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश भर में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर 53.7 फ़ीसद है. इनमें से अधिकांश महिलाएं केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित हैं. सात से 16 वर्ष आयु वर्ग की स्कूल जाने वाली लड़कियों की दर केवल 3.11 फ़ीसद है. शहरी इलाक़ों में 4.3 फ़ीसद और ग्रामीण इलाक़ों में 2.26 फ़ीसद लड़कियां ही स्कूल जाती हैं. साल 2001 में शहरी इलाक़ों में 70.9 फ़ीसद लड़कियां प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा हासिल कर पाईं, जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह दर 47.8 फ़ीसद रही. साल 1948 में यह दर क्रमश: 13.9 और 4.0 फ़ीसद थी. वर्ष 2001 में आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों का प्रतिशत शहरी इलाक़ों में 51.1 और ग्रामीण इलाक़ों में 29.4 रहा. साल 1948 में शहरी इलाक़ों में 5.2 फ़ीसद और ग्रामीण इलाक़ों में 0.9 फ़ीसद लड़कियां ही मिडिल स्तर तक शिक्षा हासिल कर पाईं. साल 2001 में मैट्रिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों की दर शहरी इलाक़ों में 32.2 फ़ीसद और ग्रामीण इलाक़ों में 11.2 फ़ीसद रही. साल 1948 में यह दर क्रमश: 3.2 और 0.4 फ़ीसद थी.

शिक्षा की तरह आत्मनिर्भरता के मामले में भी मुस्लिम महिलाओं की हालत चिंताजनक है. सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ 15 से 64 साल तक की हिंदू महिलाओं (46.1 फ़ीसद) के मुक़ाबले केवल 25.2 फ़ीसद मुस्लिम महिलाएं ही रोज़गार के क्षेत्र में हैं. अधिकांश मुस्लिम महिलाओं को पैसों के लिए अपने परिजनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है, जिसकी वजह से वे अपनी मर्ज़ी से अपने ऊपर एक भी पैसा ख़र्च नहीं कर पातीं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि मुस्लिम महिलाओं की बदहाली के लिए धार्मिक कारण काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं. इनमें बुर्क़ा प्रथा, बहुपत्नी प्रथा और तलाक़ के मामले मुख्य रूप से शामिल हैं. लड़कों की शिक्षा के बारे में मुस्लिम अभिभावकों का तर्क होता है कि पढ़-लिख लेने से कौन सी उन्हें सरकारी नौकरी मिल जानी है. फिर पढ़ाई पर क्यों पैसा बर्बाद किया जाए? बच्चों को किसी काम में डाल दो, सीख लेंगे तो ज़िंदगी में कमा-खा लेंगे. वहीं लड़कियों के मामले में वे कहते हैं कि ससुराल में जाकर चूल्हा-चौका ही तो संभालना है. इसलिए बेहतर है कि लड़कियां सिलाई-कढ़ाई और घर का कामकाज सीख लें. ससुराल में यह तो नहीं सुनना पड़ेगा कि मां ने कुछ सिखाया नहीं.

मुरादाबाद निवासी 50 वर्षीय कामिनी सिद्दीक़ी बताती हैं कि वह पढ़ना चाहती थीं, लेकिन परिवारीजनों ने उनकी पढ़ाई बीच में ही रोक दी. वह पांचवीं कक्षा में पढ़ती थीं, तभी उनका पर्दा करा दिया गया. उनसे कहा गया कि वह स़िर्फ घर के कामकाज सीखें, ससुराल में यही सब काम आएगा. पढ़ा-लिखाकर कौन सी नौकरी करानी है. उन्हें इस बात का मलाल है कि वह पढ़ नहीं पाईं, लेकिन वह अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाना चाहती हैं. उनकी चार बेटियां हैं और चारों पढ़ रही हैं. उन्होंने कहा कि वह अपनी बेटियों के साथ वह सब नहीं होने देंगी, जो उनके साथ हुआ. शबाना और निशात ने पिछले साल ही दसवीं की परीक्षा पास की है. वे बताती हैं कि ग़रीबी की वजह से उनके अभिभावक उन्हें तालीम दिलाने में सक्षम नहीं थे. इसलिए उन्होंने अपनी मां के साथ बीड़ियां बनाकर अपनी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए. उनका कहना है कि सभी लड़कियों को तालीम हासिल करनी चाहिए, क्योंकि शिक्षा ज़िंदगी को बेहतर बनाती है. अब वे ब्यूटीशियन का कोर्स करके ख़ुद का ब्यूटी पार्लर खोलना चाहती हैं. राजमिस्त्री का काम करने वाले अली मुहम्मद ने अपनी चारों बेटियों को अच्छी तालीम दी है. उनकी दो बेटियां दसवीं पास हैं और दो ने बीए तक पढ़ाई की. वह कहते हैं कि अभिभावक अपनी बेटियों के लिए दहेज इकट्ठा करते हैं, लेकिन हमने ऐसा न करके इनकी शिक्षा पर पैसा ख़र्च किया. शिक्षा ही मेरी बेटियों का ज़ेवर है, जो सारी उम्र इनके काम आएगा. चारों बहनें घर पर ज़रदोजी का काम भी करती हैं. वे कहती हैं कि पहले बिचौलिए से काम लिया करती थीं, मगर अब ख़ुद दुकानदारों से सीधा संपर्क करती हैं, जिससे उन्हें पहले से ज़्यादा मुनाफ़ा होता है, क्योंकि बिचौलिया उन्हें बहुत कम पैसे देता था.

हालांकि इस्लाम में शिक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है. इसके बावजूद मुस्लिम समाज के रहनुमाओं ने शिक्षा पर कोई विशेष ज़ोर नहीं दिया, जिसके चलते वह पिछड़ता चला गया. मौलाना ख़ालिद रशीद फिरंगी महली ने भी एक फ़तवा जारी करके कहा है कि शिक्षा हासिल करना हर मुसलमान के लिए अनिवार्य है, चाहे वह पुरुष हो या महिला. मुसलमानों को चाहिए कि वे लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि एक पढ़ी-लिखी महिला पूरे परिवार को शिक्षित कर सकती है. औलाद की बेहतर परवरिश के लिए मां का शिक्षित होना बेहद ज़रूरी है. उनका कहना है कि मौजूदा दौर में मुसलमानों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनका शिक्षा में पीछे होना है. एक हदीस में भी कहा गया है कि एक मर्द ने पढ़ा तो समझो एक व्यक्ति ने पढ़ा और अगर एक महिला पढ़ी तो समझो एक परिवार, एक ख़ानदान पढ़ा. फ़तवे में यह भी कहा गया है कि इस्लाम ही एक ऐसा मज़हब है, जिसने औलाद तो औलाद, नौकरानियों को भी शिक्षित करने पर ज़ोर दिया है. इससे ज़ाहिर है कि मुस्लिम लड़कियों को जानबूझ कर शिक्षा से दूर रखने की कोशिश की गई, ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हो सकें. हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के दौर में महिलाएं मस्जिदों में जाकर नमाज़ पढ़ती थीं. अनगिनत युद्धों में महिलाओं ने अपने युद्ध कौशल का लोहा भी मनवाया. प्रसिद्ध औहद की जंग में जब हज़रत मुहम्मद ज़ख्मी हो गए तो उनकी बेटी फ़ातिमा ने उनका इलाज किया. उस दौर में भी रफ़ायदा और मैमूना नाम की प्रसिद्ध महिला चिकित्सक थीं. रफ़ायदा का तो मैदान-ए-नबवी में अस्पताल भी था, जहां गंभीर मरीज़ों को दाख़िल किया जाता था. मुस्लिम महिलाएं शल्य चिकित्सा भी करती थीं. उम्मे-ज़ियाद, शाज़िया, बिन्ते माऊज़, मआज़त-उल-अपगरिया, अतिया असरिया और सलीम अंसारिया आदि उस ज़माने की प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक थीं. मैदान-ए-जंग में महिला चिकित्सक भी पुरुषों जैसी वर्दी पहनती थीं. हज़रत मुहम्मद की पत्नी ख़दीजा कपड़े का कारोबार करती थीं. महिला संत राबिया बसरी की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी. पुरुष संतों की तरह वह भी धार्मिक सभाओं में शिरकत करती थीं. सियासत में भी महिलाओं ने सराहनीय काम किए. रज़िया सुल्तान हिंदुस्तान की पहली महिला शासक बनीं. नूरजहां भी अपने वक़्त की ख्यातिप्राप्त राजनीतिज्ञ रहीं, जो शासन का अधिकांश कामकाज देखती थीं. 1857 की जंगे-आज़ादी में कानपुर की हर दिल अज़ीज़ नृत्यांगना अज़ीज़न बाई सारे ऐशो-आराम त्याग कर देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से छुड़ाने के लिए मैदान में कूद पड़ीं. उन्होंने महिलाओं के समूह बनाए, जो मर्दाना वेश में रहती थीं. वे सभी घोड़ों पर सवार होकर और हाथ में तलवार लेकर नौजवानों को जंगे-आज़ादी में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करती थीं. अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करने के लिए उत्कृष्ट कार्य किए.

मौजूदा दौर में भी विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं अपनी योग्यता का परिचय दे रही हैं. तुर्की जैसे आधुनिक देश में ही नहीं, बल्कि कट्टरपंथी समझे जाने वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश सरीखे देशों में भी महिलाओं को प्रधानमंत्री तक बनने का मौक़ा मिला. वाक़ई यह एक ख़ुशनुमा अहसास है कि मज़हब के ठेकेदारों की तमाम बंदिशों के बावजूद मुस्लिम महिलाएं आज राजनीति के साथ खेल, व्यापार उद्योग, कला, साहित्य, रक्षा और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही हैं.

जम्मू-कश्मीर के कुलाली-हिलकाक इलाक़े की मुनिरा बेगम ने आतंकवादियों का मुक़ाबला करने के लिए बंदूक़ उठा ली. उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चलते हुए सूरनकोट के गांव की अन्य महिलाओं ने भी हथियार उठाकर आतंकवादियों से अपने परिजनों की रक्षा करने का संकल्प लिया. जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले के कालसी गांव की रुख़साना क़ौसर ने आतंकवादियों को मार कर यह संदेश दिया कि देश में वीरांगनाओं की कोई कमी नहीं है. पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम की शबनम आरा ने तमाम अवरोधों को पार करके क़ाज़ी का पद संभाला. केरल के नावैकुलम की शाजीना ने केरल विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए की उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने परिवार का नाम रौशन किया. पश्चिम बंगाल की पपिया सुल्ताना वहां की पहली महिला पुलिस अधिकारी बनीं. एमबीए की डिग्री हासिल कर पपिया ने राज्य पुलिस सेवा की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी थी. उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा अपनी मां सलमा से मिली, जो मदरसे में शिक्षिका हैं. पपिया का कहना है कि उनके माता-पिता खुले विचारों के हैं और उन्हीं के सहयोग से आज वह इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हैं.
यह एक ख़ुशनुमा अहसास है कि पिछले कुछ बरसों में स्कूलों में दाख़िला लेने वाले मुस्लिम बच्चों, ख़ासकर लड़कियों की तादाद बढ़ रही है. नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ प्राथमिक स्तर यानी पांचवीं तक की कक्षाओं में 1.483 करोड़ मुस्लिम बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.

यह संख्या प्राथमिक स्तर की कक्षाओं में दाख़िला लेने वाले कुल 13.438 करोड़ बच्चों की 11.03 फ़ीसद है. साल 2007-08 में यह दर 10.49 फ़ीसद थी, जबकि 2006-07 में यह कुल दाख़िल बच्चों का 9.39 फ़ीसद थी. इन कक्षाओं में पढ़ रहे कुल मुस्लिम छात्रों में 48.93 फ़ीसद लड़कियां शामिल हैं. उच्च प्राथमिक कक्षाओं में भी मुस्लिम बच्चों की तादाद में इज़ाफ़ा हुआ है. यह संख्या कुल दाख़िले की 9.13 फ़ीसद है. क़ाबिले ग़ौर यह भी है कि उच्च प्राथमिक विद्यालय में लड़कियों की संख्या मुस्लिम छात्रों की तादाद की 50.03 फ़ीसद है, जबकि सभी वर्ग की लड़कियों के उच्च प्राथमिक कक्षा में कुल दाख़िले महज़ 47.58 फ़ीसदी हैं. यह रिपोर्ट देश के 35 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों के 633 ज़िलों के 12.9 लाख मान्यता प्राप्त स्कूलों से एकत्रित जानकारी पर आधारित है. यह आंकड़े मुस्लिम समाज में बदलाव के प्रतीक हैं. पिछले कुछ अरसे से मुस्लिम समाज में भी तालीम की बयार बहने लगी है. इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाला वक़्त मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा की रौशनी से जगमगाती सुबह लेकर आएगा. (ये लेखिका के निजी विचार हैं)

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