12 रबीउल अव्वल: क्या मोहब्बत के इज़हार का यह तरीका सही?

Maulana Abdul Khaliq Qasmi on 12 Rabi ul awal

मौलाना अब्दुल खालिक कासमी | TIMES OF MUSLIM
रबीयुल अव्वल का महीना इस ऐतबार से निहायत बरकत और सआदत का महीना है कि इस महीने में वो और उस दिन की वो सुबह इंसानी तारीख की नाकाबिल-ए फरामोश सुबह है, जिसमें मोहसिन-ए-इन्सानियत सरवरे कायनात फख्रे मौजूदात सरकारे दो आलम (स.अ.व.) इस दुनिया में तशरीफ लाए। आप (स.अ.व.) ने अपनी वालिदा माजिदा हज़रत आमना की आगोश में जगह पाई। वो ऐसी सुबह है जिसपर ये ज़माना उस वक्त तक फख्र करता रहेगा जब तक कि लैलो निहार की ये गर्दिश बाकि रहेगी।
मगर दिल खून के आंसू रोता है, जब हम इस अज़ीम महीने की अज़्मतों को पामाल होते हुए देखते हैं। मुसलमानों का बड़ा तब़्का इस महीने के उस खास दिन 12 रबीउल अव्वल को जिसकी सुबह एक कौल के मुताबिक आप इस दुनिया में तशरीफ लाए। शानो शौकत मनाते हैं, चिरांगा होता है, मस्जिदें सजाई जाती हैं, मिलाद की महफिलें लगती हैं, मुशायरे मुनअ़िकद किए जाते हैं। हारमोनिमों के साथ कव्वालियों पर मर्दो और औरतों के इख्तिलात के साथ झूमने के मनाज़िर पेश किए जाते हैं। क्या मर्द क्या औरतें और क्या बच्चे, सब ज़र्क-ब़र्क लिबास पहनकर उस दिन घूमते हैं, मगर जो होना चाहिए वो नहीं होता।
Maulana Abdul Khaliq Qasmi

ज़रा सोचिए तो सही वो पैगम्बर (स.अ.व.) जो वजहे तख्ली़के कायनात है, जो तमाम नबियों का सरदार है, जिसकी उम्मत तमाम उम्मतों की सरदार है। जिसको हर दम उम्मत का गम था। जिसकी वजह से उम्मत का ऐज़ाज़ो इकराम हद दर्जा बढ़ा हुआ है। जिनको कामिल दीन और मुकम्मल ज़ाब्ता-ए-हयात दिया गया। ऐसे पैगम्बर की याद मनाने के लिए हम सिर्फ 12 रबीउल अव्वल को खास कर लेते हैं, उसमें भी सिर्फ चन्द घंटे वो भी अक्सर बे तवज्जही और ग़फलत की नज़र हो जाते हैं। क्या हम समझते हैं हमने ऐसा करके अल्लाह के नबी के ऐहसानात का बदला चुका दिया। ये आपकी सीरते मुबारका के साथ सरासर ना इंसाफी है। जो एक सच्चे मुसलमान को किसी तरह ज़ैब नहीं देता है।
होना तो यह चाहिए था कि इस बात कि जुस्तजू करते हुज़ूर पुरनूर (स.अ.व.) इस दुनिया में क्यों तशरीफ लाये। आपका पैगाम क्या था। आपकी फिक्र क्या थी, आपकी तालीम क्या थी, अल्लाह के हुज़ूर आप (स.अ.व.) रातों रात क्यों गिड़गिड़ाते थे, आखिर आप क्या चाहते थे। लेकिन हो ये रहा है कि आप (स.अ.व.) की याद में होने वाली मज्लिसों में ही आपकी तालीमात का खुल्लम खुल्ला मज़ाक उड़ाया जाता है। ह़की़कत ये है कि ये मज्लिसें मुज़ाकरातो फ्वाहिश और बिदअतों खुराफात का मजमूआ बन गई हैं। इन मुज़ाकरात में से चन्द ये हैं अक्सर मुन्तज़्यीन की नमाजों का ़कज़ा होना, मर्दो और औरतों का इख्तलात डेकोरेशन पर बे जा इसराफ, फुजूल खर्ची, करीब की हर गली और चौराहे पर डेक लगाकर उनकी तेज़ आवाज़ के जरिए दूसरों को तकलीफ देना। घरों और मस्जिदों वगैरह में चिरागाह करके गैर-मुस्लिमों की मुशाबहत इख्तियार करना। सबसे अहम बात यह है कि सरकारे दोआलम (स.अ.व.) ने कभी अपना ज़श्न विलादत नहीं मनाया।
सहाबा ए किराम रजि० अ० अजमईन ने भी आपके पर्दा फरमाने के बाद कभी आप की याद में चिरागाह रोशन नहीं किए। ताबिईने इज़ाम ने भी कभी जुलूस निकालने का तरीका नहीं अपनाया। फिर आखिर ये सब क्या है? मुसलमान ये सबकुछ क्यों कर रहे हैं? क्या आका (स.अ.व.) की मोहब्बत में सहाबा-ए-किराम ताबिईन तबे-ताबिईन से भी फौ़िकयत ले गए। क्या मोहब्बत के इज़हार का यही एक तरीका है? अल्लाह दीन की सही फहम अता फरमाये और ज़िन्दगी के हर मोड़ पर इत्तिबाए सुन्नत की तौफी़क से नवाज़े....आमीन।
(लेखक जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के मुरादाबाद जिला महासचिव हैं।)

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