ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 6)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 6)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी पांच किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली पांच किश्ते नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी छठी किश्त।
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किब्ला की तब्दीली


जब तक हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम मक्का में रहे तब तक आप काबा शरीफ की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते रहे। लेकिन हिजरत के बाद जब आप मदीना मुनब्बरा तशरीफ लाएं तब अल्लाह का हुक्म हुआ कि आप अपनी नमाजें बैतुल मुकद्दस की तरफ मुंह करके पढ़े। लिहाजा आप 16 या 17 महीने तक ऐसे ही नमाज पढ़ते रहे। मगर आपके दिल की तमन्ना यही थी कि काबा ही को किब्ला बनाया जाए। लिहाजा आप अक्सर आसमान की तरफ चेहरा उठा-उठाकर इसके लिए वही-ए-इलाही का इंतजार फरमातें रहे। यहां तक की एक दिन अल्लाह तअ़ाला ने अपने हबीब सल्लल्लाहु तअ़ाला अलैहि वसल्लम की दिली आरजू पूरी फरमाने के लिए कुरान की सूरह ब़कर की आयत नाजिल फरमा दी।
खुदा-ए-तअ़ाला फरमाता है ‘‘हम देख रहे है बार-बार आपका आसमान की तरफ मुंह करना तो हम जरूर आपको फेर देेंगे उस किब्ला की तरफ जिसमें आपकी खुशी है। तो अभी आप फेर दीजिए अपना चेहरा मस्जिदे हराम की तरफ।‘‘
आप कबीला-ए-बनी सल्मा की मस्जिद में जुहर की नमाज पढ़ा रहे थे ‘वही‘ नाजिल हुयी इसी हालत में आपने बैतुल मुकद्दस की जानिब से मुड़कर खाना-ए-काबा की तरफ अपना चेहरा कर लिया। इस किब्ला बदलने को तहबीले किब्ला कहते है। तहबीले किब्ला से यहूदियों को बडी तकलीफ पहुंची। पहले यहूदी बहुत खुश थे और फख्र के साथ कहा करते थे कि मुसलमानों के नबी हमारे ही किब्ला की तरफ मुंह करके इबादत करते है। जब किब्ला बदल गया तो यहूदी इस कदर नाराज हो गए कि ताना देने लगे। कि मुहम्मद हर बात में हम लोगों की मुखालफत करते हैं।


इस्लाम में जंगे


अब तक हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम को खुदा की तरफ से सिर्फ यह हुक्म था कि इस्लामी दलीलों और करिश्मों के जरिए लोगों को इस्लाम की दावत देते रहें। और मुसलमानों को काफिरों की तरफ से दी जाने वाली तकलीफ़ों पर सब्र करने का हुक्म देते रहें। मुसलमानों ने इसी वजह से बदला लेने के लिए कभी हथियार नहीं उठाएं। हिजरत के बाद जब सारा अरब और यहूदी मुसलमानों के जानी दुश्मन हो गए और मुसलमानों को खत्म करने की ठान ली तब खुदा बंदे कुद्दुस ने मुसलमानों को हुक्म दिया कि जो लोग तुमसे जंग करें तुम भी उसका जबाब दो। चुनान्चे 12 सफर सन 2 हिजरी तारीखें इस्लाम में वह यादगार दिन है जिसमें परवरदीगार ने मुसलमानों को काफिरों के मुकाबले में तलवार उठाने की इजाजत दी। और हुक्म फरमाया ‘‘जिनसे लड़ाई की जाती है(मुसलमान) उनको भी अब लड़ने की इजाजत दी जाती है क्योंकि वह(मुसलमान) मजलूम हैं और खुदा उनकी मदद पर यकीनन कादिर है।‘‘
कुरान-ए-मजीद में अल्लाह तअ़ाला फिर फरमाता है ‘‘खुदा की राह में उन लोगों से लड़ोे जो तुम लोगों से लड़ते हैं।‘‘


जंग-ए-बदर


अबू सूफियान की सरदारी में एक काफिला तिजारत के लिए मुल्के शाम गया था। किसी ने मक्का में झूठी खबर फैला दी कि काफिले को मुसलमान लूट रहे हैं। मक्का वाले मुसलमानों से लड़ाई का बहाना तलाश रहे थे। अबू जहल अपने 1000 सिपाहियों के साथ मदीना पर चढ़ाई के लिए आ गया। उधर तिजारत से लौटते वक्त अबू सूफियान की मुलाकात अबू जहल से मदीने से 80 मील पहले एक जगह बदर पर हुयी। अबू सूफियान ने अबू जहल को समझाया कि काफिला किसी ने नही लूटा लेकिन अबू जहल नही माना और जंग के लिए जिद करता रहा। आपको जब यह पता चला तो आप सिर्फ 313 मुसलमानों को लेकर मदीना से बदर के लिए रवाना हुए। यह हिजरत का दूसरा साल और माहे रमजान की 12 तारीख थी। इस जंग में हजरते अली रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हूं, हजरत हम्ज़ा रजियल्लाहु तअ़ाला भी सरीक थे। एक सहाबी हजरत अब्दुल रहमान रजियल्लाहु अन्हु बिन औफ़ कहते है कि जंग जोरों पर थी दो छोटे बच्चें मेरे पास आए और कहा ‘‘चचा बताओ अबू जहल कौन है‘‘ उन्होने अबू जहल को दिखाया। लड़के यह सुनकर उधर भागे। थोड़ी देर बाद मेरी नजर वहां पड़ी तो देखा दोनो लड़के बढ़-बढ़कर अबू जहल पर वार कर रहे हैं। उन्होने अबू जहल को नीचे गिरा दिया। यह बच्चें मआज और मऊज़ दोनो सगे भाई थे। मुसलानों ने यह जंग जीत ली। इस जंग में 14 मुसलमान शहीद हुएं और 70 दुश्मन कत्ल हुए और इतने ही कैदी बनाए गए। 

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