ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 2)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 2)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी पहली किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली किस्त नहीं पढ़ी है तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी दूसरी किस्त।

अबू तालिब के पास

आपकी परवरिश का सिलसिला थमा नही। दादाजान की वफात के बाद वायदे के मुताबिक आपके चचा अबू तालिब ने आपकी अच्छी परवरिश की जिम्मेदारी पूरी तरह से उठायी। आपकी नेक ख़सलतों और दिल लुभा देने वाली बचपन की प्यारी-प्यारी अदाओं ने अबू तालिब को आपका ऐसा दीवाना बना दिया कि मकान के अन्दर और बाहर हर वक्त आपको अपने साथ ही रखते। अपने साथ खिलाते-पिलाते और सुलाते थे। अबू तालिब का बयान है कि मैने कभी भी ऐसा नही देखा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने किसी वक्त ंभी किसी को नुकसान पहुंचाया हो या बेहुदा लड़कों के पास खेलने के लिए गए हो। आप हमेशा इन्तहाई खुश, अखलाक, नेक एतबार, नर्म गुफ़्तार, बुलंद किरदार और अआला दर्जे के पारसा और परहेजगार रहे। 
      ‘‘गुफ्तार में, किरदार में, आमाल ओ अमल में
       उलझा हुआ दामन-ए-मुस्तफा नही देखा।
       तूने जमीन पैरों के बोसे तो ले लिए
       मेरे रसूल-ए-पाक का साया नही देखा‘‘


आपकी दुआ से बारिश

एक बार मुल्के अरब में खौफनाक अकाल पड़ गया। पूरे मुल्क मंे बारिस ना होने से सूखे के हालात पैदा हो गए। ऐसे में मुल्क के वाशिंदों ने काबा शरीफ के मुतवल्ली और सज्जादानशीन अबू तालिब के पास दुआ की दरख्वास्त के लिए पहंुचे। अहले मक्का की फरियाद पर अबू तालिब ने हुज़ूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम को अपने साथ लेकर हरमे काबा में गए और आपको दीवार-ए-काबा से टेक लगाकर बैठाकर दुआ मांगने में मशगूल हो गए। दुआ के दरमियान हुज़ूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम ने अपनी अंगुली मुबारक को आसमान की तरफ उठा दिया। एक दम चारों तरफ से काली घटाओं के साथ रिमझिम बारिस शुरू हो गयी। जिससे पूरे अरब की जमीन फिर से हरीभरी हो गयी और चारों ओर खुशहाली छा गयी।



हुजूर का कारोबारी सिलसिला




हुुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम का असल खानदानी पेशा तिजारत (व्यापार) था। चूंकि आप बचपन में ही चचा अबू तालिब के साथ कई बार व्यापार के सिलसिले में सफर फरमा चुके थे जिससे आपको व्यापारी लेनदेन का काफी तर्जुबा भी हासिल हो चुका था। सहाबा-ए-किराम का बयान है कि आप व्यापार बहुत ही नरम दिल से किया करते। व्यापार के दौरान आपकी कभी किसी से तू-तू, मंै-मैं की नौबत नही आयी। आपको तमाम अहले बाजार ‘‘अमीन‘‘(अमानतदार) के लकब से पुकाराने लगे। 
-हजरते अब्दुल्लाह बिन अबिल हमसा सहाबी रजियल्लाहु अन्हु का बयान है कि ‘‘ मैने आपसे कुछ खरीदो फरोख्त का मामला किया। कुछ रकम अदा कर दी। कुछ बाकी रह गयी थी। मैने वादा किया कि मै अभी-अभी आकर बाकी रकम भी अदा कर दुंगा। इत्तफाक से मुझे तीन दिन तक अपना वादा याद नही आया। तीसरे दिन जब मै उस जगह पहुंचा जहां मैने आने का वायदा किया था तो आपको उसी जगह मुंतजिर पाया। मगर मेरी इस वायदा खिलाफी से आपके माथे पर सिकन तक ना थी‘‘। 




आपका जवानी का किरदार


हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ला अ़लैहि वसल्लम जब जवानी के आलम में पहुंचे तो बचपन की तरह आपकी जवानी भी आम लोगों से निराली थी। 
-आपका शबाब मुजस्सम हया और चाल-चलन इज्ज़त का अनोखा नमूना था। आपकी तमाम जिंदगी बेहतरीन अखलाक़ व आदतों का खजाना थी। सच्चाई, दयानत-दारी, वफादारी, वक्त की पाबंदी, बुजूर्गों की इज्जत, छोटो से प्यार, रिश्तेदारांे से मौहब्बत, रहम व सखावत, कौम की खिदमत, दोस्तांे से हमदर्दी, अज़ीजों की गमख्वारी, गरीबों और मुफलिसों की खबर रखना, दुश्मनों के साथ नेक बर्ताव, खुदा की दी हुयी नेमतों को बरकरार रखना व उनका नुकसान ना पहुंचाना, गरज की तमाम खसलतों और अच्छी-अच्छी बातांे में आप इतनी बुलंद मंजिल पर पहुंचे हुए थे कि दुनिया के बडे से बडे इंसानों के लिए वहा तक रसाई तो क्या इसका तसब्बुर भी मुमकिन नही है। 
इसलिए आला हजरत अज़ीमुल बरकत फरमाते है- 
  ‘‘सबसे आला ओ बाला हमारा नबी
   सबसे बाला ओ बाला हमारा नबी।
   सब ऊंचों में ऊंचो समझिए जिसे
  उस ऊंचे से ऊंचा हमारा नबी।।‘‘

-आप कम बोलना, फुजूल बातों से नफरत करना, मौहब्बत के साथ दोस्तों व दुश्मनों से मिलना, हर मामले में सादगी और सफाई के साथ बात करना पसंद फरमाते। 
-आप हिर्स, तमआ, दगा, फरेब, झूठ, शराबखोरी, बदकारी, नाचगाना, लूटमार, फुहश-गोई, इश्कबाजी इन तमाम बुरी आदतों से नफरत करते। जबकि अरब में उस दौरान जहालियत का दौर था। आपका किरदार अरब में दूर-दूर तक मशहूर हो गया।


निकाह

हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की उम्र शरीफ जब 25 वर्ष की हुयी तब आपका पहला निकाह मक्का शरीफ की बहुत ही मालदार व खूबसूरत खातून हजरते बीबी खदिजा रदिअल्लाहु अन्हा (आपकी पाकीजगी को लेकर मक्का के लोग आपको ताहिरा के नाम से पुकारते थे) से हुआ। निकाह के वक्त बीबी खदीजा रदिअल्लाहु अन्हा की उम्र शरीफ 40 वर्ष थी। बडे-बडे सरदाराने कुरैश उनके साथ अक्दे निकाह के ख्वाहिशमंद थे, लेकिन उन्होने सबके पैगामों को ठुकरा दिया। मगर हुजूरे अकदस के पैगम्बराना अखलाको-आदत को देखकर और आपके हैरतअंगेज हालात को सुनकर यहां तक की उनका दिल आपकी तरफ माएल हो गया कि खुद व खुद उनके कल्ब में आपसे निकाह की रग़बत पैदा हो गयी। आपके निकाह के दौरान चचा अबू तालिब के अलावा हजरते बीबी खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के चचाजात भाई वरक़ा बिन नौफल(यहूदी) ने खड़े होकर शानदार खुत्बा पेश किए।

एलाने नबूवत


जब हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की मुकद्दस जिंदगी का 40 वां साल शुरू हुआ, तो अचानक आपकी जात ए अकदस में एक नया इंकलाब रूनुमा हो गया। आप एक-दम तन्हाई-पसंद हो गए। आपमें अकेले तन्हाई मंे बैठ कर खुदा की इबादत करने का जौक व शौक पैदा हो गया। आप अकसर अपना वक्त गौर व फिक्र में गुजारते थे। आपका ज्यादातर वक्त जिक्रे इलाही में गुजरता था। आप दिन रात खालिके कायनात(ऋष्टि के रचयिता) की जात व सिफात(विशेषणों) के तसब्बुर में मुस्तग़रक(ध्यान मग्न)़ और अपनी क़ौम के बिगडे हुए हालात के सुधार और इसकी तदबीरों(उपचार) के सोच विचार में मसरूफ रहने लगे। और इनदिनों में एक नयी बात यह भी हो गयी कि आपको अच्छे-अच्छे ख्आव(स्वपन) नजर आने लगे। और आपका हर ख्आव इतना सच्चा होता कि आप ख्आव में जो कुछ देखते उसकी ताबीर सुबह सादिक की तरह रौशन होकर जाहिर हो जाया करती थी।

ग़ारे हि़रा


मक्का मुकर्रमा से तकरीबन 3 मील की दूरी पर ‘‘जबले हि़रा‘‘ नामी पहाड़ी के उपर एक ग़ार (गुफा) है। जिसको ‘‘ग़ारे हि़रा‘‘ कहते है। ग़ारे हि़रा वो जगह है जहां हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम ने नबूवत के दौरान खुदा की इबादत की साथ ही इसी गार में आप पर कुरान-ए-पाक नाजिल हुआ।
आप अकसर कई-कई दिनों का खाना पानी साथ लेकर उस ग़ार के पुर सुकून माहौल के अंदर खुदा की इबादत में मसरूफ रहा करते थे। जब खाना पानी खत्म हो जाता तो कभी खुद घर पर आकर ले आते और कभी हजरते बीबी खदीजा रजियल्लाहू अन्हा खाना पानी गार में पहुंचा दिया करती थी। आज भी यह नूरानी गार अपनी असली हालात में मौजूद है। बतादे कि आपके दादाजान अब्दुल मुत्तलिब अपने जमाने में इस ‘‘ग़ारे हि़रा‘‘ में खाना पानी साथ लेकर जाते और कई-कई दिनों तक खुदा की इबादत में मसरूफ रहा करते थे। आपके दादाजान रमजान शरीफ के महीने में अक्सर गारे हिरा में एहतक़ाफ किया करते थे और खुदा के ध्यान में गौशा-नशीन रहा करते थे। 

COMMENTS

loading...
loading...
Name

Agra Article Bareilly Current Affairs Exclusive Hadees Interview Jalsa Madarsa News muhammad-saw Muslim Story National Politics Ramadan Slider Trending Topic Urdu News Uttar Pradesh Uttrakhand World News
false
ltr
item
TIMES OF MUSLIM: ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 2)
ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 2)
ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 2)
http://4.bp.blogspot.com/-cgebmT7-j6s/VnA_fppMLKI/AAAAAAAAQ68/D-YEHlELQ4Y/s640/hajj-festival.jpg
http://4.bp.blogspot.com/-cgebmT7-j6s/VnA_fppMLKI/AAAAAAAAQ68/D-YEHlELQ4Y/s72-c/hajj-festival.jpg
TIMES OF MUSLIM
http://www.timesofmuslim.com/2015/12/muhammad-saw-2.html
http://www.timesofmuslim.com/
http://www.timesofmuslim.com/
http://www.timesofmuslim.com/2015/12/muhammad-saw-2.html
true
669698634209089970
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy