ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 3)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 3)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी दो किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली दो किस्तें नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी तीसरी किस्त।

आपके लिए फरिश्ते लाएं कुरान की वही


एक दिन आप ‘ग़ारे हि़रा‘ के अंदर इबादत में मशग़ूल थे कि बिलकुल अचानक ग़ार में आपके पास एक फ़रिश्ता ज़ाहिर हुआ (यह हज़रते जिबरईल अ़लैहिस्सलाम थे जो हमेसा खुदा का पैगाम उसके रसूल तक पहुंचाते रहे हैं।) फरिश्ते ने एक-दम कहा कि ‘‘इकरा‘‘(पढ़िए) आप ने फरमाया कि ‘‘मा-अना बकारिन‘‘ (मैं पढ़ने वाला नही) फरिश्ते ने आपको पकड़ा और निहायत गर्मजोशी के साथ आपसे जोरदार मुअ़ानक़ा किया। फिर छोड़कर कहा कि ‘‘पढ़िए‘‘ आपने फिर फरमाया कि ‘‘मैं पढ़ने वाला नही‘‘ फरिश्ते ने दूसरी मरतबा फिर आपको अपने सीने से चिपटाया और छोड़कर कहा कि ‘‘पढ़िए‘‘ आपने फिर वही फरमाया कि ‘‘मैं पढ़ने वाला नही हूं‘‘। तीसरी मरतबा फिर फरिश्ते ने बहुत जोर के साथ अपने सीने से लगाकर छोड़ा और पांच आयतें पढ़ी।
1-‘‘इकरा बिस्मि रब्बी कल लज़ी ख़लक़‘‘
2-‘‘ख़लक़ल इंसाना मिन अलक़‘‘
3-‘‘इकरा व रब्बुकल अकरमुल्लजी‘‘
4-‘‘अल्लमा बिल क़लम‘‘
5-‘‘अल्लामुल इंसाना मालम यालम‘‘
(पढ़िए अपने रब के नाम से। जिसने सबको पैदा किया। उसने इंसान को जमे हुए खून से पैदा किया। पढ़िए आपका परवरदिगार बडा करम करने वाला है। जिसने कलम से इल्म सिखाया। इंसान को वो कुछ सिखाया जो वो नही जानता था।)
यही वो सबसे पहली ‘वही‘ थी जो आप पर नाजिल(उतारी गयी) हुयी।
फिर जिबरईल अलैहिस्सलाम ने आपसे कहा कि मैं खुदा का भेजा हुआ हूं। मेरा नाम जिबरईल है, जो कुछ मैने पढ़कर सुनाया है यह खुदा का कलाम है। और आप खुदा के आखिरी रसूल(पैगम्बर) हैं। यह कहकर जिबरईल अलैहिस्सलाम आंखों से ओझल हो गए।

आपका डर जाना


जब हुजूरे अ़कदस सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम पर पहली ‘वही‘ नाजिल हुयी तो आप उसको याद करके घर पर तशरीफ लाए। मगर इस वाकया से आप खौफ़जदा हो गए। आपने घर वालों से फरमाया कि मुझे कम्बल ओढ़ाओ। जब आपका ख़ौफ दूर हुआ तो आपने हज़रते बीबी खदीजा रजियल्लाहु अनहा से ग़ार में पेश आने वाला वाकिया बयान किया और फरमाया कि ‘‘मुझे अपनी जान का डर है‘‘ यह सुनकर आपकी बीबी साहिबा ने कहा कि नही हरगिज नही। आपकी जान को कोई खतरा नही है। आपकी बीबी साहिबा आपको अपने चचाज़ात भाई वरका बिन नौफल के पास ले गयी। वह बहुत ही बूढे, अंधे और यहूदी थे। आपने पूरा वाकिया वरका बिन नौफल को बताया। माजरा सुनकर वरका बिन नौफल चिल्ला उठे ‘‘खुदा की कसम आपके पास आने वाला वही फरिश्ता है जो मूसा अलैहिस्सलाम के पास आए थे। बेशक आप खुदा के आखिरी नबी हैं।‘‘ काश कि मैं आपके नबूवत के जमाने में जवान व तन्दूरूस्त होता तो मैं आपका साथ देता। जिन्दा रहा तो देखूंगा कि तुम्हारे लोग किस तरह तुम्हें बाहर करेंगे। जो भी कोई नबी हुआ उसके साथ ऐसा ही हुआ।‘‘
हजरते खदीजा रजियल्लाहु अन्हु ने गार का किस्सा और वरका से जब तस्दीक हुयी तो यकीन हो गया कि आप खुदा के नबी हैं। सबसे पहले आप ईमान लायीं। इस तरह अल्लाह ने उन्हें सब मुसलमानों पर बुजूर्गी अता फरमाई।
-कुछ दिनों तक आप पर ‘वही‘ उतरना बंद हो गयी।



आप पर फिर से ‘वही‘ का नाजिल होना


हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम ‘वही‘ के इंतजार में बेकरार रहने लगे। यहां तक की एक दिन आप कही घर से बाहर तशरीफ ले जा रहे थे कि किसी ने आपको ‘‘या मोहम्मद‘‘ कहकर पुकारा। आपने आसमान की तरफ नजर उठाकर देखा तो यह नजर आया कि वही फरिश्ता जो ग़ार में आया था वह आसमान और जमीन के दरमियान एक कुर्सी पर बैठा हुआ है। यह मंजर देखकर आप फिर से ख़ौफज़दा हो गए। आप अपने घर पर आ गए और फिर से कम्बल ओढ़कर लेट गए। आप कम्बल ओढ़ कर लेटे हुए थे कि अचानक आप पर सूरह-ए-‘‘मुद्दस्सिर‘‘ की इब्तिदाई आयात नाजिल हुयी और रब तअ़ाला का फरमान उतर पड़ा कि-
‘‘ऐ बाला पोश ओढ़ने वाले! खड़े हो जाओं। फिर डर सुनाओ और अपने रब की ही बड़ाई बोलो। और अपने कपड़े पाक रखो और बुतों से दूर रहो‘‘
इन आयात के नुजूल के बाद आपको खुदाबंदे कुद्दूस ने दावते इस्लाम के लिए हुकुम दिया। हुकुम पाकर आप दावते इस्लाम के लिए तैयार हो गए।
      (बुखारी जि01 स03)


दावते इस्लाम के लिए तीन दौर


दावते इस्लाम के लिए आपके तीन दौर हुए। तीन बरस तक हुजूरे अ़कदस सल्लल्लाहू तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम इन्तिहाई पोशीदा तौर पर निहायत राजदारी के सथ तबलीगे़ इस्लाम का फ़र्ज़ अदा फरमाते रहे। पहले दौर में औरतों में सबसे पहले हजरते बीबी खदीजा रजियल्लाहु अनहा और लड़कों में सबसे पहले हज़रते अली रजियल्लाहु अनहु  और गुलामों मंे सबसे पहले हज़रते जै़द बिन हारिसा रजियल्लाहु अनहु इमान लाएं। इसके बाद इमान लाने वालों का सिलसिला शुरू हो गया। दूसरे दौर में अल्लाह तअ़ाला ने अपने हबीब पर सूरह-ए-‘‘शुअरा‘‘ की आयात नाजिल फरमाई। तीसरे दौर में नबूवत का चैथा साल हुआ तो आप पर सूरह-ए-हजर की आयात ‘‘फ़स-दअ बिमा तुअ्-मरू‘‘ नाजिल हो गयी। इसके बाद आप खुलकर दीन-ए-इस्लाम के लिए  तबलीग करने लगे। यह देखकर पूरा अरब आपकी मुखालफ़त करने लगा।।



हुजुर पर जुल्म


कुफ्फारे मक्का खानदाने बनू हाशिम के इंतकाम और लड़ाई भड़क उठने के खौफ से आपको कत्ल तो नही कर सकते थे। लेकिन तरह-तरह की तकलीफ़ो और इर्ज रसानियों से आप पर जुल्मों सितम पहाड़ तोड़ने लगे। चुनांचे सबसे पहले आपको काहिन, साहिर, मजनून होने का चर्चा कर कूचा व बाजार में जोरदार प्रोपेगंडा करने लगे। आपके पीछे शरारती लड़कों का ग्रुप लगा दिया जो रास्तों में आप पर फब्तिया कसते, गालियां देते और ‘यह दीवाना है, यह दीवाना है‘ का शोर मचामचा कर आपके उपर पत्थर फेंकते। कभी कुफ्फार मक्का आपके रास्तों में कांटे बिछाते कभी आपके जिस्मे मुबारक पर नजासत डाल देते। कभी आपको धक्का देते। कभी आपकी मुकद दस और नाजुक गरदन में चादर का फंदा डालकर गला घोटने की कोशिश करते। कई मरतबा आपको नमाज की हालात में परेशान करते तो कई बार आपको कुरआन शरीफ पढ़ने पर शोर मचाते थे। लेकिन आप इन सबसे बेखबर होकर दीन-ए-इस्लाम की तबलीग में पूरी तरह से डटे रहे।


हजरते बिलाल का ईमान


हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम के साथ-साथ गरीब मुसलमानों पर भी कुफ्फारे मक्का ने ऐसे-ऐसे जुल्मों सितम के पहाड़ तोडे कि मक्का की जमीन बिलबिला उठी। इतने जुल्मों सितम के बाद भी इस्लाम कुकूल करने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। इसी सिलसिले में उमय्या बिन खलफ़ काफिर के गुलाम हजरते बिलाल रजियल्लाहु अन्हू ने भी कलमा-ए-तैयबा पढ़कर इस्लाम कुबूल किया। हजरते बिलाल रजियल्लाहु अनहु की गर्दन में रस्सी बांध कर गलियों व बाजार में घसीटा जाता था। उनकी पीठ पर लाठिया बरसाई जाती थी। और ठीक दोपहर के वक्त तेज धूप में गर्म-गर्म रेत में उनको लिटा कर इतना भारी पत्थर उनकी छाती पर रख दिया जाता कि उनकी जबान बाहर निकल आती थी। उमय्या काफिर कहता था कि इस्लाम से बाज आ जाओं वरना इसी तरह घुट घुट कर मर जाओंगे। इस हालत में भी हजरते बिलाल रजियल्लाहु अनहू की पेशानी पर बल नही आता था बल्कि वह जोर-जोर से ‘‘अहद-अहद‘‘ का नारा लगाते थे और बुलंद आवाज से कहते थे खुदा एक है खुदा एक है। हजरते बिलाल रजियल्लाहु अनहु आपके सबसे पसंदीदा सहाबियों में से थे।
   (सीरते इब्ने हिसाम जि01 स0317 त0318)



मुसलूमानों का ‘‘हब्शा‘‘ जाना


नबूवत का पांचवा साल था। कुफ्फारे मक्का ने जब अपने जुल्म व सितम से मुसलमानों पर अरसा-ए-हयात तंग कर दिया तो हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम ने मुसलमानों को ‘‘हब्शा‘‘ जाकर पनाह लेने का हुक्म दिया। ‘‘हब्शा‘‘ का बादशाह जिसका नाम ‘‘असमहा‘‘ और लकब ‘‘नज्जाशी‘‘ था। वह ईसाई दीन का पाबंद था मगर बहुत ही इंसाफ-पसंद और रहम दिल था। वह तौरात व इंजील वगैरह आसमानी किताबों का बहुत ही माहिर आलिम था। इस्लामिक कैलेंडर का सातवां माह रजब में 11 मर्द और 4 औरतों ने ‘‘हब्शा‘‘ की जानिब हिजरत की। कुफ्फारे मक्का को जब इन लोगों की हिजरत का पता चला तो इन जालिमों ने इन लोगों की गिरफतारी के लिए हुक्म दिया। लेकिन यह लोग कश्ती पर सवार होकर रवाना हो चुके थे। इसलिए कुफ्फार नाकाम होकर वापस लौट आए। इनका काफिला ‘‘हब्शा‘‘ की जमीन पर खुदा की इबादत मंे मशगूल हो गया। कुफ्फारे मक्का ने यह झूठ फैला दिया कि वह लोग भी मुसलमान हो गए। यह सुनकर ‘‘हब्शा‘‘ में मौजूद मुसलमान वापस मक्का लौट आए। लेकिन वहां कुफ्फारों ने उन्हें पकड़ लिया और उनपर पहले से ज्यादा जुल्म शुरू कर दिए। आपने फिर से इन लोगों को ‘‘हब्शा‘‘ वापस जाने को कहा। दोबारा से ‘‘हब्शा‘‘ जाने वालों में 83 मर्द और 18 औरतें शामिल रहीें।

कुफ्फारे मक्का ने छोड़ा वास्ता


एलाने नब्बूवत के छठे साल मंे हजरते हम्जा और हजरते उमर रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हू दो ऐसी हस्तियां दामने इस्लाम में आ गयी। जिनसे इस्लाम और मुसलमानों के जाहो-जलाल और उनके इज़्ज़तों इकबाल का परचम बहुत ही बुलंद हो गया। सातवंे साल कुफ्फारे मक्का ने जब देखा कि रोज व रोज मुसलमान की तादात बढ़ती जा रही है और हजरते हम्जा व हजरते उमर जैसे बहादुराने कुरैश भी दामने इस्लाम में आ गए, तो वह अपने आपे से बाहर हो गए। तमाम सरदाराने कुरैश और मक्का के दूसरे कुफ्फारो ने यह स्कीम बनायी कि आपका और आपके खानदान का मुकम्मल बायकाॅट कर दिया जाए। और उन लोगों को किसी खतरनाक जगह मंे कैद कर उनका दाना पानी बंद कर दिया जाए। सभी दुश्मनाने इस्लाम ने यह फैसला किया कि जब तक आपको कुफ्फारों के हवाले ना कर दिया जाए तब तक कोई शख्स-
-बनू हाशिम के खानदान से शादी ब्याह ना करे
-कोई शख्स इन लोगों के हाथ किसी किस्म के सामान की खरीदो फरोख्त ना करे।
-कोई शख्स इन लोगों से मेलजोल, सलामो-कलाम और मुलाकात बात ना करे।
-कोई शख्स इन लोगों के पास खाने-पीने का कोई सामान ना जाने दे।
मनसूर बिन इकरमा ने इस फरमान को लिखा और तमाम सरदराने कुरैश ने इस पर दस्तखत करके इस दस्तावेज को काबा के अंदर लटका दिया।

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ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 3)
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