ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 4)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किस्त 4)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी दो किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली तीन किस्तें नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी चौथी किस्त।

दस्तावेज को कीड़े खा गए


लगभग तीन साल तक हुजुर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम और खानदाने बनू हाशिम तमाम परेशानियों को झेलते रहे। यहां तक की खुद कुरैश के कुछ रहम दिलों के बनू हाशिम की इन मुसीबतों पर रहम आ गया। और इन लोगों ने इस जालिमाना मुआहदा को तोड़ने की तहरीक उठायी। चुनांचे हिशाम बिन अमर व आमिरी, जुहैर बिन उमैया वगैरह मिलकर एक साथ हरमें काबा में गए। सभी ने पुरजोर तरीके से इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठायी, लेकिन अबू जहल ने कियी की ना सुनी। लेकिन अबू जहल का विरोध करने वाले पूरी तरह से जुल्म के खिलाफ थे। इसी मजमे में एक तरफ आपके चचाजान अबू तालिब भी बैठे हुए थे। उन्होने कहा कि ऐ लोगों मेरे भतीजे मुहम्मद कहते है कि उन दस्तावेज को कीड़ों ने खा डाला है और सिर्फ खुदा का नाम लिखा हुआ है इसको कीड़ों ने छोड़ दिया है। लिहाजा मेरी राय है कि तुम लोग इस दस्तावेज को निकाल कर देखो अगर वाकई इसको कीड़ों ने खा लिया है तो इसको फाड़ कर फेंक दो और अगर मेरे भतीजे का कहना गलत साबित हुआ तो मैं मुहम्मद को तुम्हारे हवाले कर दूंगा। जब उन दस्तावेजों को देखा गया तो उन्हें कीड़ें खा चुके थे केवल अल्लाह तअ़ाला का नाम बचा हुआ था। यह देखकर कुरैश के चन्द बहादुर कुफ्र की हालत में होने के बाबजूद घाटी में पहुंचकर उनको वहां से निकालकर उनको अपने मकानों में पहुंचा दिया।




नब्बूवत के 11वें साल में हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम मामूल के मुताबिक हज में आने वाले कबीले वालों को दावतेे इस्लाम देने के लिए मिना के मैदान में तशरीफ ले गए और कुरान मजीद की आयतें सुना-सुना कर लोगों के सामने इस्लाम पेश करने लगे। आप मिना में घाटी के पास जहां आज मस्जिदुल अकबा है वहा तशरीफ फरमाते थे। मदीना शरीफ के कबीला-ए-खजरज के 6 आदमी आपके पास आए आपने उन लोगों से उनका नाम व पता पूछा फिर कुरान की चंद आयतें सुनाकर उन लोगों को इस्लाम की दावत दी जिससे यह लोग बेहद मुतास्सिर हो गए और वह एक दूसरे का मुंह देखकर आपस में कहने लगे कि यहूदी जिस नबी आखिरूज-ज़मा की खुशखबरी देते रहे है यकीनन वह नबी यही है लिहाजा ऐसा ना हो कि हमसे पहले कोई ओर इस्लाम की दावत कुबूल कर ले। यह कर वह 6 लोग एक साथ मुसलमान हो गए। और मदीना जाकर अपने अहले खानदान और रिश्तेदारों को भी इस्लाम की दावत दी।



नब्बूवत के 12 में साल में हज के मौके पर मदीना शरीफ के 12 लोग मिना की उसी घाटी में छुपकर आपसे दीन-ए-इस्लाम मंे शामिल हुए। साथ ही उन लोगों ने आपसे गुजारिश की कि इस्लाम की तालीम के लिए कोई मुअल्लिम उनके साथ कर दिया जाए। आपने हजरते मुसअब बिन उमैर रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हू को उन लोगों के साथ मदीना मुनब्बरा भेज दिया। वह मदीना में हजरते असअद बिन जुराराह रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हू के मकान में ठहरे और अंसार के एक-एक घर में जाकर इस्लाम की तबलीग करने लगे। धीरे-धीरे मदीना से कुबा के घर-घर इस्लाम फैलने लगा। कबीला-ए-अबस के सरदार हजरते साअद बिन मुआज़ रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हू बहुत ही बहादुर थे जब इन्हें इस्लाम के बारे में बताया तो इन्होने पहले मना किया लेकिन जब इनको कुरान शरीफ की आयतें सुनायी तो इनका दिल पसीज गया और इन्होने इस्लाम कुबूल कर लिया। इनके साथ ही पूरे अवस कबीले ने इस्लाम कुबूल कर लिया।



मेराज़ का सफर

नब्बूवत के 12वें साल के ही रजब के महीने में की 27 वीं तारीख की रात को हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम को बहालते बेदारी मेराज़ जिस्मानी हुयी। इसी सफ़र-ए-मेराज में पांच नमाजे़ फर्ज़ हुयी।
-मेराज की रात आपके घर की छत खुली। और अचानक हजरते जिबरईल अलैहिस्सलाम चंद फरिश्तों के साथ आपके पास आए और आपको सलाम अर्ज किया और अल्लाह के हुक्म से हरमे काबा में ले आए वहां से आपको बुराक(अल्लाह की तरफ से सवारी) पर सवार होकर बैतुल मुकद्दस ले आए। बुराक की तेज रफ्तारी का यह आलम था कि उसका कदम वहा पड़ता था जहां उसकी निगाह की आखिरी हद होती थी। बैतुल मुकद्दस पहुंचकर आपने उसे उस हल्का में बांध दिया जिसमें अंबिया अलैहिमुस्सलाम अपनी-अपनी सवारियों को बांधा करते थे। फिर आपने वहां तमाम अंबिया और रसूलों को दो रकआत नमाज-ए-नफ्ल जमात से पढ़ायी। जब आप यहां से निकते तो हजरते जिबरईल ने शराब और दूध के दो प्याले आपके सामने पेश किए। आपने दूध का प्याला उठा लिया यह देखकर हजरते जिबरईल ने कहा कि आपने फितरत को पसंद फरमाया अगर आप शराब का प्याला उठा लेते तो आपकी उम्मत गुमराह हो जाती। फिर हजरते जिबरईल आपको साथ लेकर आसमान पर चढ़े।


मेराज के सफर के दौरान नबियों से मुलाकात


मेराज के सफर के दौरान आपकी पहले आसमान मंे हजरते आदम अलैहिस्सलाम से, दूसरे आसमान में हजरते याहया व हजरते ईसा अलैहिमुस्सलाम से जो दोनो खालाज़ात भाई थे से मुलाकातों के साथ कुछ बातचीत भी हुयी। तीसरे आसमान में हजरते युसूफ अलैहिस्सलाम, चैथे आसमान में हजरते इदरीश अलैहिस्सलाम और पांचवे आसमान में हजरते हारून अलैहिस्सलाम, छठे आसमान में हजरते मूसा अलैहिस्सलाम और जब आप सातवें आसमान पर पहुंचे तो वहा हजरते इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मुलाकात हुयी यह बैतुल मामूर से पीठ लगाए बैठे थे जिसमे रोजाना 70 हजार फरिश्ते दाखिल होते है। मुलाकात के दौरान हर पैगम्बर ने खुश आमदीद ‘‘ऐ पैगम्बर सालेह‘‘ कहकर आपका इस्तकबाल किया। फिर आपको जन्नत की सैर करायी गयी। इसके बाद आप सिदरतुल मुन्तहा पर पहुंचे। जब आपके कदम यहां पड़े तो सिदरतुल मुन्तहा मंे रौनक फैल गयी। यहां पहुंचकर हजरते जिबरईल अलैहिस्सलाम यह कह कर ठहर गए कि अब इससे आगे मैं नही बढ़ सकता। फिर हजरते हक जल्ल जलालुहू ने आपको आसमान के ऊपर जहां तक उसने चाहा बुलाकर आपको बारे याब(रूबरू) फरमाया। जब आप बारगाहे इलाही में पहुंचे तो आप बेशुमार अतियात के अलावा तीन खास़ इनामात मरहमत हुए इनमें-
1-सूरह बक़रा की आखिरी आयतें
2-आपकी उम्मत का हर वह शख्स जिसने शिर्क ना किया हो वह बख्श दिया जाएगा।
3-उम्मत पर पचास वक्त की नमाज


5 वक्त की नमाज और 50 वक्त का सबाव


जब आप इन खुदाबंदी अतियात को लेकर वापस लौंटे तो हजरते मूसा अलैहिस्सलाम ने आपसे अर्ज किया कि आपकी उम्मत से इन पचास नमाजों का भार ना उठ सकेगा। लिहाजा आप वापस जाइए और अल्लाह तअ़ाला से कमी की दरख्वास्त कीजिए। हजरते मूसा अलैहिस्सलाम के मशविरा से कई बार आप बारगाहे इलाही में आते-जाते और अर्ज-परवाज होते रहे यहां तक की सिर्फ पांच वक्त की नमाजे रह गयी और अल्लाह तअ़ाला ने आपको फरमाया कि मेरा कौल बदल नही सकता ‘‘ऐ महबूब आपकी उम्मत के लिए यह पांच नमाजे भी पचास हांेगी। नमाजे तो पांच होंगी मगर आपकी उम्मत को मैं इन पांच नमाजों पर पचास नमाजों का अज्र व सबाब अता करूंगा।‘‘ इसी के साथ आप ठीक उसी तरह वापस जमीन पर लौट आएं। आपने पूरा मामला कुरैश के सामने फरमाया तो आपको लोग झूठा कहने लगे। कुरैश के कई लोग बैतुल मुकद्दस गए थे वही इनको यह भी मालूम था कि आप कभी बैतुल मुकद्दस नही गए। इसलिए कुरैश के लोग आपका इम्तिहान लेने के लिए बैतुल मुकद्दस की दर-दीवार और मेहराबों को लेकर सवाल करने लगे। उस वक्त अल्लाह तअ़ाला ने आपकी निगाहों के सामने बैतुल मुकद्दस का नक्शा पेश कर दिया। आप नक्शे को देखकर सभी सवालों का ठीक-ठीक जबाव देते रहे।

हिजरत मदीना शरीफ


मेराज के पांच माह बाद हज के मौके पर मदीना के तकरीबन 72 लोग मिना की उसी घाटी मंे छुपकर हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम से दीने इस्लाम में दाखिल होने के लिए पहुंचे। सभी लोगों ने इस्लाम कुबूल करके कहा कि हम दीने इस्लाम के लिए अपनी जान दे देंगे। इस मौके पर आपके चचा हजरते अब्बास रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हू भी मौजूद थे। उन्होने मदीना वालों से कहा कि देखो मुहम्मद अपने खानदान बनी हाशिम में हर तरह मुहतरम और बाईज्जत है। हम लोगों ने दुश्मनों के मुकाबले में बहादुरी से इनकी हिफाजत की है। अब तुम लोग इनको अपने वतन में ले जाने के ख्वाहिशमंद हो, तो सुन लो अगर मरते दम तक तुम लोग इनका साथ दे सको तो बेहतर है। वरना अभी यहां से चले जाओ। यह सुनकर वहां मौजूद सभी मदीना वालों ने एक साथ कहा कि हम पूरी तरह से तैयार है। इस पर आपने मुस्करा कर जबाब दिया कि तुम लोग इतमिनान रखो ‘‘तुम्हारा खून मेरा खून है, तुम्हारा दुश्मन मेरा दुश्मन, तुम्हारा दोस्त मेरा दोस्त है‘‘। यह खबर जब कुरैश के लोगों के पास पहुंची तो वह आग बबूला हो गए और मदीना वालों को हिरासत में लेने के लिए पहुंचे। वह केवल हजरते सअद बिन उबादा रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु के सिवा किसी ओर को नही पकड़ सके। लेकिन कुरैश के लोगों द्वारा की जाने वाली मुल्के शाम की तिजारत के कारण इन्हें छोड़ दिया गया।


हिजरते मदीना


मदीना मुनव्वरा में जब इस्लाम और मुसलमानों को एक पनाह-गाह मिली तो आपने सहाबा-ए-किराम को इजाजत दे दी कि वह मक्का से हिजरत करके मदीना चले जाएं। हुक्म मिलते ही सहाबा-ए-किराम मदीना मुनव्वरा के लिए हिजरत करने लगे। जो लोग कैद मंे थे या गरीबी हालात में थे वही सहाबा-ए-किराम मक्का में रहे। वही आपने इसलिए मदीना शरीफ के लिए हिजरत नही की, कि आपको खुदा का हुक्म नही मिला था। जब मक्का के काफिरों ने यह देख लिया कि आपके और मुसलमानों के मददगार मक्का से बाहर मदीना में भी हो गए और मदीना जाने वाले मुसलमानों को अंसार ने अपनी पनाह में ले लिया है तो कुफ्फारे मक्का को यह खतरा महसूस होने लगा कि कही ऐसा ना हो कि मुहम्मद भी मदीना चले जाएं और वहां से अपने साथियों की फौज लेकर मक्का पर चढ़ाई कर दे। इस खतरें से निपटने के लिए कुफ्फारे मक्का ने अपने पंचायत घर में एक बहुत बडी काॅन्फ्रेस की। काॅन्फे्रस में मक्का के सभी ताकतवर शख्स शामिल हुए। इस काॅन्फ्रेंस में शैतान लईन इब्लीश नाम बदल कर शामिल हुआ। जब लोग अपनी राय देने लगे तो इब्लीश ने सभी की राय को बेकार बताया। तभी वहां मौजूद अबू जहल ने राय दी कि सभी बहादुर सरदार एक साथ मुहम्मद पर तलवारों से हमला कर उनका कत्ल कर दें जिससे किसी पर शक नही होगा। इस पर सभी की रजामंदी हो गयी और काॅन्फ्रेंस खत्म कर दी गयी।

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