ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 5)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 5)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी चार किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली चार किश्ते नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी पांचवी किश्त।

हिजरते रसूल


जब कुफ्फार हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहिवसल्लम के कत्ल पर राजी होकर अपने-अपने घरों की ओर रवाना हुए तभी हजरते जिबरईल अलैहिस्सलाम (अल्लाह का फरिश्ता) अल्लाह तअ़ाला का हुक्म लेकर नाजिल हुए और आपसे कहा कि आज रात को आप अपने बिस्तर पर ना सोएं और हिजरत करके मदीना शरीफ तशरीफ ले जाएं। हुक्म पाकर आप दोपहर के वक्त हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु के घर तशरीफ ले गए और उनसे फरमाया कि सब घर वालों को हटा दो कुछ मशविरा करना है। आपने उनसे फरमाया कि अल्लाह तअ़ाला ने मुझे हिजरत की इजाजत फरमा दी है। उन्होने अर्ज किया कि मुझे भी अपने साथ चलने का मौका दीजिए। और अपनी दो ऊटनियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि आप एक ऊटनी कुबूल फरमा लें। आपने फरमाया कि मंै इसकी कीमत दुंगा। उन्होने ना चाहते हुए भी हुजूर की फरमाईश पर राजी हो गए और हिजरत की मुकम्मल तैयारी कर ली। उधर कुफ्फारे मक्का ने अपने प्रोग्राम के मुताबिक आपके मकान को घेर लिया और इंतजार करने लगे कि आप सो जाएं तो आपपर कातिलाना हमला कर आपका कत्ल कर दें। उस वक्त आपके साथ मौला अली मौजूद थे।

मौला अली का इम्तिहान


हालांकि मक्का के लोग हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की ईमानदारी के कारण आपके पास बेशकीमती चींजे रख दिया करते थे। आपके पास मक्का वालों की बहुत सी अमानतें रखी हुयी थी। आपने हजरते अली रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु से फरमाया कि तुम मेरी सब्ज(गहरा हरा) रंग की चादर ओढ़ कर मेरे बिस्तर पर सो जाओं और मेरे चले जाने के बाद तुम कुरैश के लोगों की तमाम अमानतें उनके मालिकों को सौंप कर चले आना। मौला अली को मालूम था कि कुफ्फारे मक्का आपको कत्ल करने का इरादा कर चुके है। मगर आपके इस फरमान से मौला अली को पूरा यकीन था कि मैं जिंदा रहुंगा और मदीना पहुचुंगा। मौला अली आपके बिस्तर पर सुबह तक सोते रहे। और उधर आप अपने बिस्तर पर मौला अली को सुलाकर एक मुटठी खाक हाथ में ले ली और ‘‘सूरह-ए-यासीन‘‘ की इब्तिदाई आयातों को पढ़ते हुए अपने मकान से बाहर आएं और वहा मौजूद काफिरों के सिरों पर खाक डालते हुए वहा से साफ निकल गए। आप ना किसी को नजर आए और ना किसी को खबर हुयी। आप वहा से सीधे काबा शरीफ पहुंचे और फरमाया कि ‘‘अगर मेरी कौम मुझे तुझसे ना निकालती तो मैं किसी और जगह सुकून ना पाता।‘‘


गार-ए-सौर में ठहरें


आप हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु के साथ मदीना शरीफ के लिए रवाना हुए। पहले आप काफी परेशानियांे के बाद गारे सौर पहुंचे। वहां हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने गार की साफ-सफाई की। आप हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु की गोद में सिर रखकर सो गए। और हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने अपने एक पैर से गुफा में हो रहे छेद को ढक दिया। इतने में एक सांप आया और उनके पैर पर डसने लगा। लेकिन हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने उफ तक ना कि लेकिन जब सांप ने कई बार डंसा तो उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े जो हुजूर के रूखसार पर गिर गए जिससे आपकी नींद टूट गयी। आपने जब उन्हें रोते देखा तो वजह पूंछीं। जब पूरा मामला पता चला तो आपने अपना लुआब उनके पैर पर लगाया जिससे उनका सारा दर्द दूर हो गया। कई दिन तक आप गारे सौर में रहे। इस बीच हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु दिन में मक्का जाते और हालात पर नजर रखकर रात मंे गार में लौट आते। वही हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु के गुलाम हजरते आमिर बिन फुहेरा रजियल्लाहु तआला अन्हु अपनी बकरिया लेकर गार के पास आ जाते और उन बकरियों का दूध दोनो आलम के ताजदार और उनके यारे गार पी लेते थे।

गार पर बुना मकड़ी ने जाला


उधर कुफ्फारे मक्का ने आपकी तलाश में चप्पा-चप्पा छान मारा। यहां तक कुफ्फारे मक्का आपको ढूंढते हुए गारे सौर तक पहुंच गए। मगर गार के मुंह पर मकड़ी ने जाला बुन दिया था और किनारे पर कबूतरी ने अंडे़ दे रखे थे। यह नजारा देख कर कुफ्फारे कुरैश आपस में कहने लगे कि अगर इस गार में कोई इंसान मौजूद होता तो यहां ना मकड़ी जाला बुनती और ना कबूतरी अंडे़ देती। कुफ्फार की आहट पाकर गार में मौजूद हजरते अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु कुछ घबराकर बोले कि या रसूलल्लाह अब हमारे दुश्मन इस कदर करीब आ गए है कि अगर वह अपने कदमों पर नजर डालेंगे तो वह हमको देख लेंगे। यह सुनकर आपने फरमाया कि ‘‘मत घबराओ खुदा हमारे साथ है‘‘। इसके बाद अल्लाह तअ़ाला ने उन्हें हिम्मत अता फरमाई। बहरहाल चैथे दिन आप गारे सौर से बाहर आएं। आपने रास्ता बताने के लिए एक नौकर अब्दुल्लाह बिन उरीकत को रखा था जो गार के बाहर दो ऊटनियों के साथ मौजूद मिला। आप ऊंटनी पर सवार हुए और एक पर हजरते अबू बकर रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हू व हजरते आमिर बिन फुहेरा रजियल्लाहु तअला अन्हु बैठे और सफर के लिए चल दिए। आप आम रास्ता से हटकर साहिले समुंद्री रास्तों से सफर करने लगे।


शहंशाहे रिसालत मदीने में


काफी कठिनाईयों और कई दिन के सफर के बाद आप मदीना शरीफ पहुंचे। मदीना मुनव्वरा में पहले से ही आपके आने की खबर पहुंच चुकी थी। औरतों, बच्चों तक की जबानों पर आपकी आमद का चर्चा था। इसलिए अहले मदीना आपके दीदार के लिए इन्तिहाई बेकरार थे। वह रोजाना सुबह से शहर के बाहर इकट्ठा हो जाते और तेज दोपहरी तक आपके इस्तकबाल के लिए तैयार रहते थे। आप 12 रबी उल अव्वल को आप मदीना मुनव्वरा से तीन मील के फासले पर जहां आज मस्जिदे कुबा बनी हुयी है वहां तशरीफ लाएं। आप कबीलाए अमर बिन औफ़ के खानदान में हजरते कुलसूम बिन हिदस रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु के मकान में तशरीफ फरमाई। अहले खानदान ने इस फख व शरफ पर ‘‘अल्लाहु अकबर‘‘ का पुरजोर नारा बुलंद किया। जब आपकी आमद मदीना शरीफ में हुयी तो एक यहूदी ने इसकी खबर अपने किला से मदीना वालों को दी, जिसे सुनकर मदीना शरीफ में खुशी की लहर दौड़ गयी। मदीना शरीफ के लोग हाथों में झंड़े लेकर और ‘‘नारा-ए-तकबीर‘‘ की बुलंद सदाआंे के बीच आपके इस्तकबाल के लिए दौड़ पड़े।


मस्जिदों की बुनियाद


मस्जिद-ए-कुबा
कुबा में सबसे पहला काम एक मस्जिद की तामीर थी। इसी मकसद के लिए आपने हजरते कुलूम बिन हिदम रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु की एक जमीन को पसंद फरमाया जहां खानदाने अमर बिन औ़फ की खजूरें सुखाई जाती थी। इसी जगह आपने अपने मुकद्दस हाथों से एक मस्जिद की बुनियाद डाली। यही वह मस्जिद है जो आज भी मस्जिदे कुबा के नाम से मशहूर है।
मस्जिदुल जुमा
मस्जिद-ए-कुबा की तामीर 14 या 15 दिन में पूरी हुयी। मस्जिद की तामीर के बाद जुमा के दिन आप कुबा से शहर-ए-मदीना की ओर रवाना हुए। रास्ते में कबीला-ए-बनी सालिम की मस्जिद में पहला जुमा आपने पढ़ाया। यही वह मस्जिद है जो आज भी मस्जिदुल जुमा के नाम से मशहूर है।
मस्जिद-ए-नबवी
मदीना शरीफ में कोई ऐसी जगह ना थी जहां मुसलमान जमात के साथ नमाज पढ़ सकें। इसलिए मस्जिद की तामीर निहायत जरूरी थी। आपकी कयामगाह के करीब ही ‘‘बनू नज्जार‘‘ का एक बाग था। आपने मस्जिद तामीर करने के लिए इस बाग को खरीदना चाहा उन लोगों ने इसकी कीमत लेने से मना कर दिया। लेकिन आपने इस जमीन के असल मालिक दो यतीम बच्चों को बुलाया। उन बच्चों ने भी जमीन की कीमत लेने से मना कर दिया बाबजूद इसके आपने उन बच्चों को जमीन की कीमत दे दी। फिर आपने खुद अपने हाथों से मस्जिद की बुनियाद डाली। कच्ची ईंटों की दीवार और खजूर के सुतूनों पर, खजूर की पत्तियों से छत बनायी। इसी मस्जिद का नाम मस्जिदे नबवी है। इस मस्जिद की इमारतें अव्वल, 60 गज लम्बी और 54 गज चैड़ी थी। इसका किब्ला बैतुल मुकद्दस की तरफ बनाया गया था। मगर जब किब्ला बदल कर काबा की तरफ हो गया तो मस्जिद की शिमाली जानिब एक नया दरवाजा कायम किया गया। मस्जिद-ए-नबवी में ही आपका रोज़ा-ए-मुबारक है।

अजान की इब्तिदा


मस्जिदे नबवी की तामीर तो मुकम्मल हो गयी मगर लोगों को नमाजों के वक्त जमा करने का कोई जरिया ना था, जिससे नमाज जमात के साथ कायम हो सके। इस सिलसिले में आपने सहाबा-ए-किराम से मशविरा फरमाया। तो किसी ने नमाजों के वक्त आग जलाने का मशविरा दिया तो किसी ने नगाड़ा बजाने की राय दी। मगर आपने इन तरीकों को पसंद नही फरमाया। हजरते उमर रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने यह तजबीज़ पेश की कि हर नमाज के वक्त किसी आदमी को भेज दिया जाए जो पूरी मुस्लिम आबादी में नमाज का ऐलान कर दे। आपने इस राय को पसंद फरमाया और हजरते बिलाल रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु को हुक्म फरमाया कि वह नमाज के वक्त लोगों को पुकार दिया करें। चुनांचे वह ‘‘अस्सलातु जामिअतुन‘‘ कहकर पांचों नमाजों के वक्त ऐलान करते थे। इस दरमियान मंे एक सहाबी हजरते अब्दुल्लाह बिन जै़द अंसारी रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने ख्आव में देखा कि अजाने शरई के अल्फाज कोई सुना रहा है। इसके बाद आपको और दूसरे सहाबा को भी इसी किस्म के ख्आव नजर आए। आपने इसको मिन-जानिबिल्लाह समझ कर कुबूल फरमाया। और हजरते बिलाल को अजान के कलिमात सिखा कर उनसे अजान दिलवायी गयी। शरई अजान का तरीका आज तक जारी है और यह कयामत तक जारी रहेगा।

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