ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 7)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 7)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी 6 किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली 6 किश्ते नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी सातवीं किश्त।
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जंग के नियम

हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाल अ़लैहि वसल्लम ने जंग करने के लिए नियम बनाएं। जिसमें मुसलमानों को हिदायत दी गयी कि जंग के दौरान अपने बचाव के लिए ही हथियार उठाओं। बच्चे, बूढ़ो और औरतों पर हमला ना करें। बल्कि पहले उन्हें किसी महफूज जगह पहुंचा दें। आपने जंग के दौरान पेड़ पौधों को भी नुकसान ना पहुंचाने की हिदायत दी।
वही जंगे बदर में जो कैदी बनाए गए उनमें जंगी कैदी एक-एक, दो-दो करके सहाबा-ए-किराम में बांट दिए गए। आपने हुक्म दिया कि इन्हें आराम से रखा जाए। आपने कैदियों के साथ दुश्मनी की बजाए दोस्ती का बर्ताव किया। जो कैदी रूपए दे सकते थे उन्हें मामूली फिदिया लेकर छोड़ दिया गया। जिनमे फिदिया देने की ताकत ना थी उन्हें हुक्म दिया कि दस मुसलमान बच्चों को लिखना पढ़ना सिखा दें। और जो कैदी अनपढ़ थे उसे वैसे ही छोड़ दिया गया।

जंग-ए-उहुद

जंग-ए-बदर की हार से मक्के वालों की बडी रूसवाई हुयी। वह इसका बदला लेना चाहते थे। बदला लेने के लिए मक्का वालों ने जंग-ए-बदर के तकरीबन एक साल बाद अबू सूफियान की सदारत में एक फौज तैयार कर मदीने की ओर चढ़ाई कर दी। इस फौज में तीन हजार सिपाही थे। जबकि हुजूर की फौज में सात सौ सहाबी थे। जब दुश्मनों की फौज मदीना शरीफ से तीन मील दूर उहूद पहाड़ पर पहुंची तब मदीना में इसकी मालूमात हुयी। इस लड़ाई मंे मक्का वालों के साथ उनकी औरतें भी थी जो गा बजाकर अपने मर्दाें में जोश पैदा कर रही थी। इसमें अबू सूफियान की बीबी भी शामिल थी। जो अपने भाई का बदला लेना चाहती थी। उसने एक हब्शी हब्श बिन हरब को कुछ माल का लालच देकर हजरते अमीर हम्जा रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु जो हुजूर के चचा थे को कत्ल करने का हुक्म दिया। चुनान्चे इसी जंग में हजरते अमीर हम्जा रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु शहीद हुए। और इसी जंग में दोनो जहां के सरदार हुजूर सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम के दन्दाने मुबाकर(दांत) शहीद हुए। इस जंग में 70 मुसलमान शहीद हुए। अबू सूफियान मुसलमानों के इतने नुकसान ही को अपनी फतह समझ कर खुश होकर वापस चला गया।


जंग-ए-खंदक

रसूले पाक सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम ने मदीना के यहूदियों के साथ रहने का समझौता किया। लेकिन चंद दिनों में ही यहूदियों ने यह समझौता तोड़ दिया। यहूदियों की इस हरकत के सबब इन्हें मदीना से निकाल दिया गया। इसका बदला लेने के लिए यहूदी मक्का वालों से मिल गए और मुसलमानों को खत्म करने की साजिशे रचने लगे। इन लोगों ने अबू सूफियान की सदारत मंे 10 हजार सिपाहियों की एक फौज तैयार कर मदीना पर चढ़ाई कर दी। जंग की खबर जब आपको हुयी तो आपने सहाबी हजरते सलमान फारसी रजियल्लाहु अन्हु की राय पर मदीना शरीफ के चारों ओर 3 हजार सहाबियों की मदद से खंदक(खाई) खुदवाई। दुश्मनों ने हमला कर दिया खंदक को उमरू बिन अब्दुद जो ताकतवर पहलवान था ने पार कर ली। हजरते अली रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने इस काफिर को कत्ल कर दिया।  इसके मरते ही मुसलमानों में जोश आ गया और काफिरो में खलबली मच गयी। इसके बाद दुश्मन खंदक पार करने की जुर्रत ना कर सकें। एक महीने तक काफिरों द्वारा मदीना का घेरा करने के बाद अल्लाह तअ़ाला ने मुसलमानों की सुनी और मौसम ने ऐसी करवट ली कि जबरदस्त आंधी आयी और काफिरों के खेमे उखड़ गए। खाने पीने का सामान मिट्टी में मिल गयर। काफिरों में ऐसी घबराहट पैदा हुयी कि जिसका मुंह जिधर उठा वह उधर भाग गया। इस जंग की कामयाबी से मुसलमानों का रौब फिर से कायम हो गया।

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