ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 8)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 8)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी 7 किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली 7 किश्ते नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी आठवीं किश्त।
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सुलैह हुदैविया (हुदैविया का समझौता)


-मुसलमान इस साल बगैर हज करें वापस चले जाएं।
-अगले साल आएं मगर तीन दिन से ज्यादा ना ठहरें।
-हथियार लगाकर ना आएं, सिर्फ तलवार साथ हो वह भी म्यान में। और म्यान भी थैले में हो।
-मक्का में जो मुसलमान हैं उनमे से किसी को अपने साथ ना ले जाएं। और मुसलमानों में से कोई मक्का में रहना चाहे तो उसे ना रोके।
-जो मुसलमान या काफिर मदीना जाएं उसे वापस कर दिया जाए। लेकिन अगर कोई मुसलमान मक्का आ जाएगा तो वह वापस नही किया जाएगा।
-अरब के दूसरे कबीले पर कोई पाबंदी ना होगी, वो जिसके साथ चाहें समझौता कर लें।
इसी बीच सुहैल का बेटा अबू जुंदाल जोकि मुसलमान हो गया था। जख्मी हालात में आपके कदमों में आकर गिर गया। सुहैल ने कहा कि सुलह की शर्तों के मुताबिक अबू जुंदाल को वापस करों। आपने फरमाया कि अभी सुलहनामा पर दस्तखत नही हुए हैं इसलिए सुलह अभी अधूरी है। सुहैल ने सुलह करने से मना कर दिया। आपने फरमाया कि अच्छा इसे भी ले जाओं। अबू जुंदाल जख्मों से चूर थे उनकी हालात देखकर मुसलमान तड़प उठे उनका खून खौल उठा। आप हर हाल में वादा पूरा करना चाहते थे। आपने उसी जगह जहां सुलह हुयी हज के सारे अरकान पूरे किए और मुसलमानों के साथ वापस मदीना रवाना हो गए। यह सुलह, हुदैविया के स्थान पर हुयी थी इसलिए इसको सुलैह हुदैविया कहते है। 

 खैबर की जंग

खैबर मदीना से दो सौ मील दूर है। यह बड़ा हरा भरा इलाका है। हुजूर ने जिन यहूदियों को मदीना से निकाला था वह यहा आकर आबाद हुए थे। उन्होने यहा मजबूत किले बना रखे थे जिनपर उन्हें नाज था। वो सारे अरब को मुसलमानों के खिलाफ भड़काते रहते थे। जब यह ताकतवर हो गए तो इन्होने मदीना पर हमले की साजिश रची। हुजूर ने यह सुनकर अपना एक आदमी यहूदियांे के पास भेजा कि वह ऐसी हरकतें ना करे और सुलह कर लें। पहले यहूदी सुलह पर राजी हो गए लेकिन फिर उनकी नीयत बदल गयी और हुजूर के भेजे हुए आदमी को कत्ल करने की सोचने लगे लेकिन हुजूर के आदमी को वक्त पर पता चल गया। उसने यहूदियों के सरदार को कत्ल कर दिया। यहूदियों ने गुस्से में आकर मदीना पर चढ़ाई कर दी। मुसलमानों के चारागाह से ऊंट पकड़ लिए।। हजरत अबू ज़र के बेटे को शहीद कर दिया और उनकी बीबी को गिरफ्तार करके ले गए। अब मुसलमान चुप नही बैठ सकते थे। हुजूर 1600 मुसलमानांे के साथ इस इरादे से मदीना से रवाना हुए कि यहूदी दब जाएंगे और सुलह कर लेंगे लेकिन यहूदियों को अपने किलों पर घमण्ड था इससे यहूदी सुलह के लिए तैयार ना हुए और जंग छिड़ गयी। 20 दिन गुजरने के बाद हुजूर ने फरमाया कल मैं उस आदमी को इस्लामी झंड़ा दूंगा जो खुदा और उसके नबी मुहम्मद को दोस्त रखता है और अल्लाह और उसका नबी भी उससे मौहब्बत करते हैं। उसी के हाथ से जंग फतह होगी। सुबह हुयी हुजूर ने आवाज दी ‘‘अली कहा हैं?‘‘ हजरत अली की आंखों में तकलीफ थी उन्हें यह उम्मीद ना थी कि उनसे यह काम लिया जाएगा। हुजूर ने अली की आंखों में अपने मुंह का लुआब लगाकर दुआ फरमायी और उनकी आंखें बिलकुल ठीक हो गयीं। हुजूर ने इस्लामी फौज का झंड़ा अली के हाथों में दिया। जंग छिड़ी एक यहूदी सरदार मरहब हजरते अली के मुकाबले आया। हजरते अली ने एक ही वार में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। मरहब के मरते ही यहूदियों ने हमला बोल दिया। यहूदियों के बड़े-बड़े सरदार मारे गए और उनके सारे किले फतह हो गए। 
रसूले पाक सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम को मक्का से आए 6 साल गुजर गए थे। हज के महीने में आप 1400 सहाबा के साथ हज के लिए मक्का रवाना हुए। इनदिनों लड़ाईयां बंद हो जाती थी। हज को आने वाले मुसलमान उमरा के लिए अहराम, कुर्बानी के जानवर और म्यान में बंद तलवार साथ लेकर आएं। मक्का के पास मुसलमानों को पता चला कि कुरैश लड़ाई के लिए तैयार है। यह सुनकर हुजूर ने मुसलमानों को वही ठहरने का हुक्म दिया, इस जगह का नाम हुदैविया था। यही से हुजूर ने मक्का वालों के पास पैगाम भेजा कि हम हज के लिए आएं है लड़ने नहीं। तुम कुछ अर्से के लिए सुलह कर लो। इस पैगाम का जबाव न आया तो आपने दूसरा आदमी भेजा उसकी सवारी को कुरैश ने मार डाला। इसके बाद मक्का वालों ने एक आदमी मुसलमानों के लश्कर का हालात जानने के लिए भेजा। उसने वापस जाकर मुसलमानों के सारे हालात कुरैश कबीले में बयान करते हुए कहा कि मैने बड़े-बड़े बादशाहों के दरबार देखे हैं, मगर ऐसी मोहब्बत व जानिशारी कही नही देखी। कबीले पर इन बातों का कोई असर ना हुआ और कुछ लोगों को भेजकर मुसलमानों पर हमला कर दिया। हमलावर लोगों को हिरासत में ले लिया गया, मगर आपने उन्हें छोड़ दिया। आखिर में आपने हजरत उस्मान गनी रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु को सुलह के लिए मक्का भेजा। कुरैश ने उन्हें रोक लिया। अफवाह यह फैल गयी कि उनको शहीद कर दिया गया है। बाद में कुरैश ने सुहैल नामी एक शख्स को आपके पास भेजा और सुलह की शर्ते तय हुयी कि 

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