ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 9)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) की जिंदगी पर एक नज़र (किश्त 9)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। ईद मिलादुन्नबी 24 दिसम्बर को है। इस मौके पर TIMES OF MUSLIM आपको हमारे प्यारी नबी हजरत मुहम्मद सल के जिंदगी के बारे में बता रहा है। जिसकी 8 किस्त आप पढ़ चुके हैं (यदि आपने पहली 8 किश्ते नहीं पढ़ी हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)। लीजिए पेश है इसकी नवीं किश्त।
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मक्का फतह


हुदैविया की सुलह को दो साल भी नही गुजरे थे कि मक्का वालों ने वायदा खिलाफी कर दी। अरब में एक कबीला बनू ख़जआ मुसलमानों के साथ और दूसरा बनू बकर कुफ्फारे मक्का के साथ था। बनू बकर ने बनू ख़जआ पर हमला कर दिया। कुरैश ने उनका साथ दिया जिससे बनू ख़जआ को बहुत नुकसान हुआ। वो रसूलल्लाह की खिदमत में हाजिर हुए और सारा वाकया बयान किया। हुजूर ने एक आदमी को पैगाम लेकर भेजा कि हमारे दोस्तों को खून का बदला दो या अपने हिमायतियों की मदद करना छोड़ दो। अगर यह दोनों बांते मंजूर न हो तो हुदैविया की सुलह के खत्म होने का ऐलान कर दो। जोश में आकर कुरैश ने सुलह खत्म कर दी। इसके बाद कुरैश ने अबू सूफियान को मजबूर करके मदीना भेजा ताकि दोबारा सुलह हो सके। अबू सूफियान के मदीना पहुंचने पर रसूले पाक, हजरते अबू बकर और हजरते उमर रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने उसकी बात न सुनी। उसने खुद ही मस्जिदे नबवी मंे ऐलान किया कि हम हुदैविया की सुलह के पाबंद रहेंगे।

मक्का फतह-2 


कुरैश की रोज की शरारतों को हमेसा के लिए खत्म करने के इरादे से आप मक्का की तरफ रवाना हुए। आपके साथ 10 हजार फौज थी। रमजान का महीना था। मक्का से एक मंजिल के फासले पर आपने पड़ाव डाला। कुरैश घबरा गए और इस्लाम का सबसे बडा दुश्मन अबू सूफियान हुजूर की खिदमत में हाजिर होकर मुसलमान हो गया। अब मुसलमानों का लश्कर मक्का की तरफ बड़ा। हुजूर ने ऐलान किया कि जो आदमी हथियार रख देगा उसे कुछ ना कहा जाएगा। जो अपने घर का दरवाजा बंद कर ले या अबू सूफियान के घर में चला जाए उसके लिए भी अमन है। जो काबा के अंदर चला जाएगा उसे भी माफ कर दिया जाएगा। मुसलमान बेरोक टोक मक्का में दाखिल हो गए। इनमें वो लोग ज्यादा थे जिन्हें मक्का से निकाल दिया गया था और उनके घरों पर कब्जा कर लिया गया था। किसी के दिल में भी दुश्मन से बदला लेने का ख्याल तक ना था। यह उनके प्यारे रसूल की तालीम थी कि कमजोर पर हाथ न उठाओं। इसके बाद आप काबा में दाखिल हुए आपने वहा रखे 360 बुतों को हटाते हुए फरमाया ‘‘हक आ गया और बातिल मिट गया, यकीनन बातिल को मिटना ही था।‘‘ इसके बाद अल्लाह के रसूल ने कुरान की यह आयत पढ़ी-‘‘लोगों मैने तुमको मर्द और औरत से पैदा किया है। और तुम्हारे कबीले और खानदान इसलिए बनाए है ताकि तुम एक दूसरे से पहचाने जाओं। खुदा के नजदीक ज्यादा शरीफ वह है जो उससे डरने वाला है। यकीनन अल्लाह जानने वाला और खबर रखने वाला है।‘‘
वहा मौजूद लोगांे में वो सब लोग थे जो इस्लाम को मिटाना चाहते थे, उनकी राह में कांटे बिछाया करते थे। यह लोग जानते थे कि अल्लाह के नबी को तंग करने में हमारी जिंदगी गुजरी है। वो यह भी जानते थे कि बुरों को बख्श देना हुजूर की आदत है। वो फौरन बोल उठें आप शरीफ भाई और शरीफ भाई के बेटे हैं, रहम कीजिए-रहम कीजिए। माफी मांगने वाले से बदला लेना रसूले पाक की शान के खिलाफ था। आपने फरमाया ‘‘तुम पर कोई इल्जाम नही जाओं तुम सब आजाद हो।‘‘ यह सिर्फ हुजूर का अख्तियार था यह देखकर मक्का के लोग पुकार उठें कि सचमुच आप खुदा के रसूल हैं। मक्का फतह के बाद सारा अरब मुसलमान हो गया।

आखिरी खुत्बा(संदेश)-- हज्जतुल विदा



हिजरत के दसवी साल रसूलल्लाह हज के इरादे से मक्का रवाना हुए। मुहाजिर, अंसार और दूसरे मुसलमानों की बहुत बडी तादात आपके साथ थी। मक्का पहुंचकर आपने काबा का तवाफ किया।
9 जुलहुज्जा को अरफात के मैदान में सारे मुसलमान जमा हुए। हुजूर ने ऊटनी पर सवार होकर देखा जहां तक आंख काम करती थी इंसान ही इंसान दिखाई देते थे। लोगों की तादात एक लाख चैबीस हजार के लगभग थी। इस मौके पर आपने मुसलमानों से आखिरी बार खिताब फरमाया। इसी खिताब को आखिरी खुत्बा कहा जाता है। आपने आखिरी खुत्बा में मुसलमानों से फरमाया कि--
‘‘जो लोग यहां है वो उन लोगों तक जो यहा मौजूद नही हैं यह पैगाम पहुंचा दें।‘‘
फिर अल्लाह की तारीफ के बाद आपने फरमाया-
‘‘ऐ लोगों! जो कुछ मैं कहता हूं उसे गौर से सुनो। हो सकता है कि मैं अगले साल या आज के बाद इस जगह तुमसे ना मिल सकूं। जैसा यह दिन, यह महीना और यह शहर हुरमत(इज्जत) वाला है, उसी तरह तुम्हारा माल और जान एक दूसरे पर हराम है। याद रखों तुम्हें खुदा के सामने जाना है वो तुमसे तुम्हारे आमाल का हिसाब लेगा। खबरदार! मेरे बाद राह से बे राह न होना। मेरे बाद अब कोई पैगम्बर नही आएगा न तुम्हारे बाद कोई और उम्मत पैदा होगी। अच्छी तरह सुन लो अपने अल्लाह की इबादत करों पांच वक्त की नमाज पढ़ों। रमजान के रोजे रखों, अपने माल की जकात दो, लोगों की अमानते उनके सुपुर्द करों, दूसरे पर जुल्म न करो ताकि तुम पर जुल्म न किया जाए। ऐ लोगों! औरतों तुम पर हक है जैसा कि तुम्हारा हक उन पर है, औरतों के साथ नरमी का बर्ताव करो, गुलामों से अच्छा सुलूक रखों, अगर उनसे कोई गलती हो जाए तो माफ कर दो, जो खुद खाओं वही उन्हें खिलाओ, जो खुद पहनों वही उन्हें पहनाओं। अरबी को अज़मी पर और अज़मी को अरबी पर कोई बडाई नही हैं। सब मुसलमान भाई-भाई हैं। अपने भाई की कोई चीज तुम्हारे लिए जायज नही जब तक वो अपनी खुशी से तुम्हें न दे। मैं तुम में अल्लाह की किताब ‘कुरान‘ छोड़ कर जा रहा हूं, अगर इस पर अमल करोगे तो कभी गुमराह ना होगे। हर काम में नियत ठीक रखों। मुसलमान भाई की भलाई चाहों और आपस मंे फूट न डालों।‘‘
इसके बाद आपने फरमाया-
‘‘कयामत के दिन तुमसे मेरे बारे में पूछा जाएगा कि मैने खुदा का पैगाम तुम तक पहुंचा दिया या नही। तुम क्या जवाब दोगे?‘‘
सबने मिलकर कहा ‘‘बेशक आपने अल्लाह का पैगाम पहुंचा दिया।‘‘
रसूलल्लाह ने आसमान की तरफ उंगली उठाकर तीन बार कहा-‘‘ऐ अल्लाह! गवाह रहना मैने तेरा पैगाम लोगों तक पहुंचा दिया।‘‘
उसी वक्त जिबरईल अलैहिस्सलाम(अल्लाह के फरिश्ता) खुदा का यह पैगाम लेकर आए। जो कुरान-ए-मजीद की आखिरी आयत है।
‘‘अल-यौम्ा अक-मल्तू लकुम दी-नकुम व अत-मम्तु अलैकुम नेअमती व र-जीतु ल-कुमुल इस्लाम्ा दीना।‘‘
(आज मैने तुम्हारे लिए दीन को मुकम्मल कर दिया और अपनी नेमते तुम पर पूरी कर दी और तुम्हारे लिए दीन इस्लाम को पसंद किया।)
इस खुत्बे के तीन दिन बाद आप मदीना तशरीफ ले गए।

आपकी दुनिया से रूखसती


हमारे आका ताजदारे मदीना सल्लल्लाहु तअ़ाला अलैहि वसल्लम 12 रबी उल अव्वल सन 11 हिजरी में इस दुनिया से हम लोगों की आंखों से हमेशा-हमेशा के लिए ओझल हो गए। आपकी उम्र शरीफ 63 साल की थी। मदीना वालों के लिए यह दिन रात से भी ज्यादा काला था। हर शख्स रो रहा था। हजरत उमर रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु को तो यकीन ही नही आया कि हुजूर का इंतकाल हो गया है। वो तलवार लेकर खड़े हो गए और कहने लगे ‘‘जो शख्स यह कहेगा कि हुजूर वफात पा गए मैं उसे मार डालूंगा।‘‘ हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने उनकी यह हालात देखी तो मस्जिद में आए और कुरान की यह आयतें पढ़ी-‘‘मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल ही तो हैं उनसे पहले भी रसूल आए और चले गए। अगर यह वफात पा जाएं या शहीद कर दिए जाएं तो क्या तुम दीन से फिर जाओगे।‘‘
यह सुनकर सब खामोश हो गए।
-हुजूर ने वसियत फरमा दी थी कि मेरे गुस्ल से लेकर दफनाने तक की रस्में मेरे अहले बैत व अहले खानदान करें।
-सारी रस्में आपके खानदान के ही लोगों ने अंजाम दी।
-आपको गुस्ल हजरते फ़जल बिन अब्बास, हजरत कुसम बिन अब्बास, हजरत अली, हजरत अब्बास और हजरत उसामा बिन जै़द रजियल्लाहु अन्हुम ने मिलकर दिया।
-गुस्ल के बाद ‘सहूल‘ गांव के बने हुए तीन सूती कपड़ों का कफन बनाया गया। इनमें कमीज व अमामा न था।
-आपके जनाजे की नमाज पहले मर्दों ने फिर औरतों ने उसके बाद बच्चों ने अदा की। जनाजा-ए-मुबारका हुजरा-ए-मुकद्दसा के अंदर ही था। बारी-बारी से लोग अंदर जाते रहे और नमाज अदा करते रहे। कोई इमाम न था।
-आपकी कबे्र मुबारक हजरते अबू तल्हा अंसारी रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हु ने तैयार की जो बगली थी।
-आपके जिस्मे अतहर को हजरत अली, हजरत फजल बिन अब्बास, हजरत अब्बास, हजरत कुसम बिन अब्बास रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हुम ने कब्र में उतारा। लेकिन अबू दाउद की रिवायतों से मालूत होता है कि हजरत उसामा और अब्दुल रहमान बिन औफ़ रजियल्लाहु तअ़ाला अन्हुम भी कब्र में उतरे थे।
-हुजूर ने अपनी वफात के बाद न दिरहम ओ दीनार छोड़ा, न कनीज व गुलाम न और कुछ। सिर्फ अपना सफेद खच्चर और हथियार और कुछ जमीन जो आम मुसलमानों पर सदका करके छोड़ी गयी थी।

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