ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) का सफरनामा (पार्ट-1)

ईद मिलादुन्नबीः हुजूर मुहम्मद (सल०) का सफरनामा (पार्ट-1)

मोहम्मद आमिल | TIMES OF MUSLIM
आगरा। अरब एक मुल्क है उसके एक शहर का नाम मक्का है। यहां खुदा के एक नबी हजरते इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने खुदा की इबादत के लिए एक घर बनाया था उसे काबा कहते है। मुसलमान हज करने के लिए यहीं जाते हैं और नमाज भी इसी की तरफ मुंह करके पढ़ते हैं। मक्का मंे हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे हजरते इसमाईल अलैहिस्सलाम की औलाद आबाद थी। उनके कई कबीले थे, जिनमे एक कबीला कुरैश बहुत मशहूर था। कुरैश का एक खानदान बनू हाशिम कहलाता था। इसके सरदार अब्दुल मुत्तलिब थे। यह काबा की देखभाल करते थे इसलिए लोग इनकी बहुत इज्जत करते थे। इनके एक बेटे अब्दुल्लाह थे, इनकी बीवी का नाम आमना था। इन्हीं बीवी आमना के यहां हमारे प्यारे नबी हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की पैदाईश हुयी।


मुल्के अरब


मुल्क-ए-अरब एशिया के पश्चिम इलाका का एक देश है।  अरब को तीन इलाको से समुद्र ने घेर रखा है। वही चैथी तरफ से फुरात नदी से टापू (द्वीप) की तरह घिरा हुआ है। इसके उत्तर दिशा में े-ए-इराक, पश्चिम दिशा में बहरे-अहमर, दक्खिन दिशा में बहरे-हिन्द वही पूरब दिशा में ख़लीज-ए-अ़म्मान व ख़लीज-ए-फ़ारस है। अरब मुल्क में उपजाऊ जमीन कम है वही चारों ओर रेगिस्तान व पहाड मौजूद है। अरब मुल्क को आठ हिस्सों में बांटा गया है। 
1-हिजाज
2-यमन
3-हज़रमूत
4-महरा
5-अ़म्मान
6-बहरेन
7-नज्द
8-अहक़ाफ़

मक्का मुकर्रमा


अरब मुल्क के पहला हिस्सा हिजाज़ के पूरब दिशा में मौजूद शहर है मक्का। मक्का शहर को एक ओर से ‘‘जबले अबू कुबैस‘‘ व दूसरी ओर से ‘‘जबले कुएैक़िअ़ान‘‘ दो बडे-बडे पहाड़ों ने घेर रखा है, और इसके चारों तरफ से छोटी-छोटी पहाड़ियों और रेतीले मैदानों का सिलसिला दूर-दूर तक चला गया है। इसी मुबारक शहर में हुजूर शहन्शाहे-कौनेन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादते-बा-सआदत (पैदाईश) हुई। मक्का मुकर्रमा का बन्दरगाह और हवाई अडडा ‘‘जेददाह‘‘ है। मक्का मुकर्रमा में हर साल इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने जुल हिज्जा में तमाम दुनिया के लाखों मुसलमान हज्ज के लिए आते है। मक्का मुकर्रमा के मशहूर मक़ामात(स्थान) है।
1-काबा मुअ़ज़्ज़मा
2-सफ़ा
3-मरवा
4-मिना
5-मुज़दलिफ़ा
6-अ़रफ़ात
7-ग़ारे हिरा
8-ग़ारे सौर
9-जबले तनईम
10-जिइर्राना

काबा शरीफ


मक्का शहर में काबा शरीफ है। काबा शरीफ की बुनियाद सबसे पहले हजरत जिबरईल अलैहिस्सलाम(अल्लाह के फरिश्ते) और हजरते आदम अलैहिस्सलाम(अल्लाह के पहले नबी) ने रखी। हजरत नूह अलैहिस्सलाम(नबी) के जमाने में सैलाब से काबा की तामीर एक टीले के रूप में रह गयी ।तब अल्लाह के हुक्म से हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम(नबी) ने काबा शरीफ की तामीर की। कुरैश के जमाने में जब काबा शरीफ की इमारत को बनाने की जरूरत महसूस हुयी तो उन्होने मुकम्मल तौर पर नई इमारत बनाने का ऐलान किया और यह तय हुआ कि इसमें हलाल माल खर्च होगा। उस वक्त के अमीरों के पास ब्याज का हासिल रूपया था। इसलिए हलाल माल कम तादात में हासिल हुआ। तो कुरैश ने माल की कमी की वजह से काबा शरीफ की इमारत को छोटा बना दिया औैर कुछ जमीन काबा के बाहर निकाल दी। काबा से बाहर निकली हुयी जमीन को हतीम कहा जाता है। हतीम शरीफ काबा के बाहर की जमीन है इसे गोल घेरे के रूप में छोटी दीवार से नुमाया किया गया है। हज और उमरा के दौरान तवाफ इसके बाहर से ही होता है क्यांेकि यह भी काबा ही है। काबा शरीफ के अंदर सिर्फ वक्त के बादशाह को जाने की इजाजत है और वह चुनंदा लोग जो साल भर काबा का गिलाफ बनाते है। लेकिन अल्लाह की रहमत हम गरीबों पर भी है कि उसने हतीम शरीफ की जगह बनाकर हम गरीबों को भी काबा में दाखिल होने का मौका दिया। 

मदीना मुनव्वरा

मक्का मुकर्रमा से तकरीबन तीन सौ बीस किलोमीटर की दूरी पर मदीना मुनव्वरा है। जहां मक्का मुकर्रमा से हिजरत फरमाकर हुजूरे अकरम सल्लाल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम तशरीफ लाए और दस बरस तक आप यहां रहकर इस्लाम की तब्लीग फरमाते रहे। इसी शहर में आपका मज़ारे मुकद्दस है जो मस्जिदे नबवी के अंदर ‘‘गुंबदे खज़रा‘‘ के नाम से मशहूर है। मदीना मुनव्वरा का पुराना नाम यसरब था। जब हुजूर ने इस शहर में सुकूनत फरमाई तो इसका नाम मदीनतुन-नबी (नबी का शहर) पड़ गया। फिर यह नाम मुख्तसर होकर मदीना मशहूर हो गया। तारीखी हिसाब से यह बहुत ही पुराना शहर है। यहां अरब के दो कबीले अबस व खजरज के अलावा यहूदी आबाद थे। चूंकि मदीना की आबो-हवा अच्छी नही थी। यहां तरह-तरह की बीमारियां फैलती थी। जब हिजरत के दौरान हुजूर व सहाबा यहां आए तो कुछ सहाबा यहां की हवा से बीमार होने लगे तो आपने मदीना मुनव्वरा के लिए अल्लाह तअ़ाला से दुआ फरमाई। आपकी दुआ के असर से मदीना मुनव्वरा आज तक महक रहा है।


आका की आमद मरहबा


मक्का मुकर्रमा के कुरैश कबीले के बनू हाशिम खानदान में वालिद(पिता) ‘अब्दुल्लाह‘ वालिदा(मां) ‘बीबी आमना‘ के घर 12 रबीउल अव्वल मुताबिक 20 अप्रैल 571 ई0 दिन पीर, सुबह सादिक के वक्त हमारे प्यारे नबी हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम आलम-ए-वजूद में रौनक अफ्रोज(पैदा) हुए। आपकी पैदाईश पर आसमां व जमीं झूम उठी। अल्लाह के फरिश्ते हजरते जिबरईल अलैहिस्सलाम सत्तर हजार फरिश्तों के साथ जमीं पर तीन झंड़े लेकर आए। इनमें एक झंड़ा पूरब दिशा, दूसरा झंड़ा पश्चिम दिशा व तीसरा झंड़ा काबा शरीफ की छत पर गाड़ा। जब आप पैदा हुए उस दौर में अरब की सरजमीं पर चारों ओर कुफ्र का आलम था। औरतांे पर जुल्म हुआ करते थे, शराबखोरी, चोरी, कत्ल जैसी वारदातें आम हुआ करती थी। आपकी पैदाईश से पहले आपके वालिद साहब का इंतकाल हो गया। 6 वर्ष की उम्र में आपकी वालिदा भी आपसे रूखसत हो गयीं। वालिद व वालिदा के इंतकाल के बाद आपकी परवरिश आपके दादाजान अब्दुल मुत्तलिब ने की। 8 वर्ष की उम्र में आपके दादा का इंतकाल हो गया। आपके दादाजान ने हुजूर की परवरिश की जिम्मेदारी अपने छोटे बेटे अबू तालिब को सौंपी। दादा के बाद आपकी परवरिश आपके चचाजान अबू तालिब ने की। 

दूध पीने का जमाना


मुल्क-ए-अरब का रिवाज था कि अरब के लोग अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए आस-पास के देहातों में भेज देते थे। देहात की साफ-सुथरी आबो-हवा में बच्चों की तंदरूस्ती और जिस्मानी सेहत भी अच्छी हो जाती थी और वह खालिस और फसीह अरबी जबान सीख जाते थे। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सबसे पहले अबू लहब की कनीज हजरते सुबैवा का दूध नोश फरमाया। फिर अपनी वालिदा माजिदा हजरते आमिना के दूध से सैराब होते रहे। एक रोज मक्का में देहात की औरतें बच्चों को दूध पिलाने व साथ ले जाने के लिए आयीं। उस दौर में बीबी आमना के हालात काफी तंग थे। यह जानकर कोई औरत बीबी आमना के घर हुजूर को लेने नही गयीं। उधर देहात से आयीं हजरते हलीमा सादिया की कमजोर हालात को देखकर किसी भी शहरे मक्का ने उन्हें कोई बच्च नही दिया। बाद में आपको हजरते हलीमा सादिया अपने साथ ले गयीं। जब हजरते हलीमा सादिया आपको लेकर आयीं तो उनके हालात अचानक से बेहतर हो गए। हजरते हलीमा सादिया के बेहतर हालात को देखकर सभी चैंक उठें। इस दौरान हजरते हलीमा सादिया कबीले में रहकर आपको दूध पिलाती रही और उन्ही के पास आपके दूध पीने का जमाना गुजरा। आपने दो साल तक हजरते हलीमा सादिया का दूध पिया वही आप पांच साल तक हजरते हलीमा सादिया के पास रहें। इस दौरान आप जिद करके हजरते हलीमा सादिया की बकरियां चरातें।


बचपन की अदाएं

हजरते हलीमा का बयान है कि आपका झूला फरिश्तांे के हिलाने से हिलता था। और बचपन में चांद की तरफ उंगली उठाकर इशारा फरमाते थे तो चांद आपकी उंगली के इशारों पर हरकत करता था। जब आपकी ज़बान खुली तो सबसे अव्वल जो कलाम आपकी ज़बान-ए-मुबारक से निकला वह था-
‘‘अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर अल्हमदुलिल्लाहि रब्बिल आ-लमीन व सुब्हानल्लाहि बुकरतोवं व असीला‘‘ 
जब आप अपने पांव पर चलने के काबिल हुए तो बाहर निकलकर बच्चों को खेलते हुए देखते। मगर खुद खेल-कूद में शरीक नही होते थे। लड़के आपको खेलने के लिए बुलाते तो आप फरमाते ‘‘मैं खेलने के लिए नही पैदा किया गया हूं।‘‘
(मदारिजुन-नुबुव्वह जि0-2 स0-21)

हज़रते आमना की वफ़ात


हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहू तअ़ाला अलै़हि वसल्लम की उम्र शरीफ जब 6 वर्ष की हो गयी तो आपकी वालिदा माजिदा हजरते बीबी आमना आपको साथ लेकर मदीना मुनब्बरा आपके दादा जान अब्दुल मुत्तलिब के ननिहाल बनू अ़दी बिन नज्जार में रिश्तेदारों की मुलाकात व अपने शौहर की कब्र की जियारत के लिए तशरीफ ले गयी। वहां से वापसी पर ‘‘अबवा‘‘ नामी गांव में हजरते बीबी आमना की वफात हो गयी। और आपको वही पर दफना दिया गया। आपके वालिदे माजिद का साया तो विलादत से पहले ही उठ चुका था। अब वालिदा माजिदा का हाथ भी आपके सर से उठ गया। आपकी परविरश आपके दादाजान अब्दुल मुत्तलिब ने की लेकिन वह भी आपकी 8 वर्ष की उम्र में आपसे रूखसत हो गए।

जारी...

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