हिन्दुस्तान की आज़ादी का इतिहास अली बंधुओं के बग़ैर अधूरा

हिन्दुस्तान की आज़ादी का इतिहास अली बंधुओं के बग़ैर अधूरा

मोहम्मद आमिल, आगरा (टाइम्स ऑफ़ मुस्लिम)

जहां तक खुदा के एहकाम का तआल्लुक है, मैं पहले मुसलमान हूं, बाद में मुसलमान हूं, आखिर में मुसलमान हूं- लेकिन जब हिंदुस्तान की आजादी का मसला आता है, तो मैं पहले हिंदुस्तानी हूं, बाद में हिंदुस्तानी हूँ , आखिर में हिंदुस्तानी हुँ :- मौलाना मुहम्मद अली जौहर محمد علی جوہر

हिन्दुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अली बंधुओं का नाम लिए बग़ैर अधूरा और नामुकम्मल कहा जाएगा।  इतिहास गवाह है कि अली बंधुओं ने हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ हुकूमत के खि़लाफ़ कितनी ज़ोरदार आवाज़ बुलंद की थी, हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम करने और सबको एक प्लेटफ़ार्म पर लाने के लिए कितने पापड़ बेले थे, जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। ये सारी बातें इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, लेकिन आज जब स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों का नाम लिया जाता है, तो महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरु और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद इत्यादि के साथ ‘रईसुल अहरार’ मौलाना मोहम्मद अली जौहर का नाम कभी नहीं लिया जाता, जबकि वह पहली क़तार के सिपाहियों में शामिल थे।

उन्होंने अंग्रेज़ों से लड़ने और हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम करने के लिए रातों की नींद और दिन का चैन न्योछावर कर दिया था, अंगे्रज़ शासकों के ज़्ाुल्म सहे थे, जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ारा था। आज़ादी का परवाना लेने के लिए वह बीमारी की हालत में स्ट्रेचर पर लेट कर गोल मेज़ काॅन्फ्रेंस में भाग लेने लंदन पहुंचे थे और उस समय अपने भाषण में कहा था – ” मेरे मुल्क को आज़ादी दो या मेरे कब्र के लिए मुझे दो गज जगह दे दो क्योंकि यहा मै अपने मुल्क की आज़ादी लेने आया हु और उसे लिए बिना वापस नही जाऊंगा”
‘हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम को अंजाम तक पहुंचाने और सफलता दिलाने में जिन चीज़ों ने अहम् कारनामे अंजाम दिए, उनमें से एक उर्दू अख़बार भी हैं। उर्दू अख़बारों की इन सेवाओं को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास इन अख़बारों के अध्ययन के बगै़र अधूरा है। बीसवीं शताब्दी के शुरू में उर्दू में साप्ताहिक, दैनिक और पत्रिकाओं की शक्ल में बहुत से अख़बार निकल रहे थे। उन्हीं में से एक मौलाना मोहम्मद अली जौहर का अख़बार ‘हमदर्द‘ भी था, जो 23 फ़रवरी 1913 से दिल्ली से निकलना शुरू हुआ। ये एक दैनिक अख़बार था। शुरू में इसमें केवल दो पृष्ठ होते थे, लेकिन बाद में यह 8 पृष्ठों का हो गया। इसका मक़सद हिन्दुस्तानी अवाम और ख़ास कर हिन्दुओं और मुसलमानों में एकता का जज़्बा पैदा करना था।‘
मोहम्मद अली के पूर्वज नजीबाबाद के रहने वाले थे , आखरी मुग़ल बादशाह “बहादुर शाह ज़फर” की हिफाज़त के लिए 1857 में वे लोग देल्ही आ गए थे , पहली जंगे आज़ादी में मोहम्मद अली के 200 से जादा रिश्तेदार शहीद हो गए थे , मुग़ल सल्तनत के ज़वाल के बाद मोहम्मद अली के दादा रियासत “रामपुर” चले आये और वही नुक़ीम हो गए .
मौलाना मोहम्मद अली जौहर 10 दिसंबर, 1878 को रामपुर में एक महान मां के घर पैदा हुए जो रामपुर में बी अम्मा के नाम से मशहूर है ।
बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण पालन-पोषण और शिक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी मां को निभानी पड़ी. रिवायत के अनुसार, उर्दू और फ़ारसी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई. इसके बाद उन्होंने बरेली से हाईस्कूल किया. आगे की पढ़ाई के लिए वह अलीगढ़ गए और वहीं उन्होंने बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की. बड़े भाई शौकत अली की तमन्ना थी कि मौलाना जौहर आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विसेज़) की परीक्षा पास करें, जिसके लिए उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भेजा गया, लेकिन मौलाना वहां असफल रहे.
लंदन से वापसी के बाद मौलाना चाहते थे कि वह अलीगढ़ में उस्ताद की हैसियत से अपनी सेवाएं दें, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. विवश होकर उन्हें रामपुर में उच्च शिक्षा अधिकारी के पद पर काम करना पड़ा. कुछ दिनों तक उन्होंने रियासत बड़ौदा में भी काम किया, लेकिन मौलाना को ख़ुदा ने किसी और काम के लिए पैदा किया था. शुरू से ही उनकी ख्वाहिश थी कि वह पत्रकारिता को अपना पेशा चुनें और इसके द्वारा देश की सेवा करें. 1910 से उन्होंने कलकत्ता से एक अंग्रेज़ी अख़बार कामरेड निकालना शुरू किया. 1912 में जब अंग्रेज़ों ने दिल्ली को अपना केंद्र बना लिया तो मौलाना जौहर भी दिल्ली आ गए और यहां से उन्होंने 1914 से उर्दू दैनिक हमदर्द निकालना शुरू किया. ये दोनों अपने समय के मशहूर अख़बार थे, जिनका उदाहरण आज भी कम ही मिलता है.
वे भारत की आज़ादी और खिलाफत आंदोलन की मशाल वाहक के कट्टर समर्थक थे। 1920 में खिलाफत आंदोलन के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया ।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर के पूरे जीवन का अध्ययन करने के बाद जो तथ्य सामने आते हैं, उनका निष्कर्ष यह है कि मौलाना के स्वभाव में ठहराव नहीं था. वह एक अच्छे शायर बन सकते थे, लेकिन शायरी में जिस स्वभाव की ज़रूरत होती है, वह उनके अंदर नहीं था. इसी तरह वह एक बेहतर शिक्षाविद् बन सकते थे, लेकिन यहां भी उनके क़दम ज़्यादा दिनों तक नहीं ठहरे. वह एक महान राजनीतिज्ञ बन सकते थे, “वे मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे” लेकिन कुछ दिनों के बाद उन्होंने राजनीति को अलविदा कह दिया. इसी तरह पत्रकारिता के मैदान में भी जब उन्होंने क़दम रखा तो बड़ी सफलता हाथ लगी, लेकिन बाद में कई चीज़ों के बावजूद जो कुछ विरासत उन्होंने उर्दू साहित्य या पत्रकारिता में छोड़ी, वह हमारे लिए अमूल्य है. मौलाना की शायरी पर अगर नज़र डालें तो हमें कुछ ऐसे शेर ज़रूर मिल जाते हैं, जिन्हें हम बेहतरीन शेरों का दर्जा दे सकते हैं. मसलन उनके ये दो शेर आज भी लोगों को रटे हुए हैं:
तौहीद तो यह है कि ख़ुदा हश्र में कह दे
यह बंदा दो आलम से ख़फ़ा मेरे लिए है,

…………………………………………………………..
क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है
इस्लाम ज़िंदा होता है, हर कर्बला के बाद.

मौलाना की यह शायरी सिर्फ़ उन्हीं दिनों का नतीजा है, जब वह जेल में थे. ख़ाली समय में, जबकि उन पर हर तरह की पाबंदी लगी थी, लेकिन दिल और दिमाग़ पर भला कौन पाबंदी लगा सकता है. लिहाज़ा शायरी का यह ज़ख़ीरा आज हमारे सामने है.
जेल से बाहर आने के बाद राजनीतिक हंगामों और पत्रकारिता की ज़िम्मेदारियों ने उन्हें कभी इसकी मोहलत नहीं दी कि वह पल भर के लिए भी शायरी कर लिया करें.
साहित्यिक सरमाए के रूप में मौलाना के कुछ पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं, जो उन्होंने अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को लिखे. इनमें हमें उनकी साहित्यिक झलक देखने को मिल जाती है. ये पत्र उनके निजी जीवन को उजागर करते हैं.

मौलाना मोहम्मद अली जौहर के राजनीतिक जीवन पर अगर नज़र डालें तो भारतीय इतिहास में उनका सबसे बड़ा कारनामा ख़िलाफ़त तहरीक है. यह वह तहरीक थी, जो तुर्की के मुसलमानों के समर्थन में शुरू की गई थी, लेकिन बाद में इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का रूप धारण कर लिया. यही वह प्लेटफार्म था, जहां से महात्मा गांधी ने अपनी राजनीतिक शुरुआत की.
मौलाना मोहम्मद अली जौहर जामिया के पहले वाइस चांसलर यानी शैखुल जामिआ बने। वे ख़िलाफ़त आन्दोलन के नेता थे। इनके भाई मौलाना शौकत अली भी आन्दोलनकारी थे। इन्होंने एक ख़िलाफ़त बैंड बनाया। जब भी कोई जुलूस निकाला जाता था तो यह बैंड कुछ विशेष धुनें बजाता था। इस बैंड का नाम ही ख़िलाफ़त बैंड पड़ गया। अली बन्धुओं को जब गिरफ्तार किया गया तो बैंड के लोग सामूहिक स्वर में एक तराना गाते थे,
‘बोली अम्मा मौहम्मद अली की, जान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो।’
‘ऐ मेरे लाडलो! मेरे प्यारो! ऐ मेरे चांद और मेरे तारो!

बोली अम्मा मोहम्मद अली की जान , बेटा खिलाफत पे दे दो
साथ है तेरे शौकत अली भी जान , बेटा खिलाफत पे दे दो.

तुम ही हो मेरे घर का उजाला, इसी वास्ते था तुम को पाला.
काम नही कोई इस से आला, जान बेटा खिलाफत पे दे दो

सब्र से जेलख़ाने मे रहना, जो मुसीबत पड़े उसको सहना।
बूढ़ी अम्मा का कुछ ग़म न करना, कलमा पढ़के ख़िलाफ़त पे मरना,

पूरे इस इम्तिहां में उतरना।
बोली अम्मा मौहम्मद अली की, जान बेटा, ख़िलाफ़त पे दे दो।’

ख़िलाफ़त तहरीक ने हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध ला खड़ा किया. दोनों ही संप्रदायों ने बड़े जोश और जज़्बे के साथ अंग्रेज़ों के ख़िला़फ कड़े क़दम उठाने शुरू किए, ताकि भारत को आज़ाद कराया जा सके. इसके लिए मौलाना ने हर तरह की यातनाएं सहीं. वह मरते दम तक अंग्रेज़ों से इस बात के लिए लड़ते रहे कि या तो देश आज़ाद करो या फिर मरने के बाद दो गज़ ज़मीन अपने देश में दे दो. वह किसी गुलाम देश में मरना नहीं चाहते थे. इतिहास गवाह है कि उन्होंने अपना वचन पूरा करके दिखा दिया. “आखिर लंदन में 4 जनवरी 1931 को उनका इन्तेकाल हो गया और 23 जनवरी 1931 को बैतूल मुक़द्दस (फिलिस्तीन) में उनको दफ्न कर दिया गया।”
राजनीतिक जीवन में बहुत से ऐसे मोड़ भी आए, जब उन्हें मायूसी का सामना करना पड़ा. मौलाना कभी नहीं चाहते थे कि हिंदू -मुसलमान एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन जाएं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें ऐसे दिन भी देखने पड़े. अपनी ओर से उन्होंने पूरी कोशिश की कि दोनों संप्रदाय दोबारा एक हो जाएं और अपनी शक्ति एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बर्बाद करने के बजाय उसे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लगाएं.
हमदर्द की फाइलें गवाह हैं कि राष्ट्रीय एकता के लिए मौलाना ने अनगिनत प्रयास किए. मसलन वह मुसलमानों को हमेशा समझाते रहे कि अगर गाय की कुर्बानी देने से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती तो वे उससे गुरेज़ करें और गाय की जगह किसी दूसरे जानवर की कुर्बानी करें. इसी तरह वह हिंदुओं से कहते थे कि मुहर्रम का महीना मुसलमानों के लिए मातम और ग़म का महीना होता है, इसलिए वे मुसलमानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए कम से कम वहां पर ख़ुशियां मनाने से परहेज़ करें, जहां मुसलमानों का आम तौर पर आना-जाना रहता है.
मौलाना जौहर चाहते थे कि दूसरे राष्ट्रीय रहनुमा भी उनके इस मिशन में उसी तरह कोशिश करें, जैसे वह कर रहे हैं, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी. आख़िरकार वह इतने निराश हुए कि उन्होंने कांग्रेस से ही किनारा कर लिया. कांग्रेस एक ऐसी राजनीतिक पार्टी थी, जिस पर मौलाना को बहुत विश्वास था, लेकिन बाद में कुछ ऐसे लोग इसमें शामिल हो गए, जिनके कारनामे संदेह के घेरे में आते थे. इससे मौलाना का विश्वास इस पार्टी से उठ गया.
एक पत्रकार की हैसियत से मौलाना ने एक महान कारनामा अंजाम दिया. उन्होंने दो अख़बार निकाले कामरेड और हमदर्द. कामरेड अंग्रेज़ी का अख़बार था, जबकि हमदर्द उर्दू का. कामरेड एक ऐसा अंग्रेज़ी अख़बार था, जिसका लोहा अंग्रेज़ भी मानते थे. उसके महत्व का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेज़ कामरेड की कॉपी अपने दोस्तों के लिए बतौर तोहफ़ा लंदन ले जाते थे. इस अख़बार को निकालने का मक़सद दरअसल अंग्रेज़ों को भारतीय जनता की समस्याओं से अवगत कराना था.
दूसरा अख़बार हमदर्द था, जिसे मौलाना जौहर ने भारतीय जनता और ख़ासकर मुसलमानों के प्रशिक्षण और शिक्षा के लिए निकालना शुरू किया था. इस अख़बार में जहां एक ओर इस्लामी देशों की ख़बरें हुआ करती थीं, वहीं दूसरी ओर देशी और विदेशी ख़बरें भी प्रकाशित होती थीं.
इसके अलावा शेर-ओ-शायरी, हास्य-व्यंग्य और सांस्कृतिक कॉलम भी हुआ करते थे. मौलाना जौहर पत्रकारिता के सिद्धांतों के पक्षधर थे. इन सिद्धांतों को ज़िंदा रखने के लिए वह बड़ी से बड़ी आर्थिक क्षति सहने को तैयार रहते थे. मौलाना का यह सिद्धांत था कि कोई भी ख़बर बिना प्रमाण के प्रकाशित न की जाए.

मौलाना अख़बार में विज्ञापन छापने के कड़े विरोधी थे. अगर वह चाहते तो ऐसा करके बहुत पैसा कमा सकते थे, लेकिन उन्होंने आर्थिक लाभ के बजाय पत्रकारिता के सिद्धांतों को वरीयता दी. मौलाना हर दिन शाम को स्टाफ़ के साथ बैठक करते और अख़बार से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत करते. उन्होंने समाचार प्राप्ति के लिए रायटर और एसोसिएटेड प्रेस की सेवाएं लीं और लेथो की जगह टाइप के प्रकाशन को विकसित किया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सके.
हम यह कह सकते हैं कि मौलाना जौहर ने साहित्य, राजनीति एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में जो कुछ भी विरासत छोड़ी, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उनके बिना भारतीय इतिहास पूरा नहीं हो सकता. ज़रूरत इस बात की है कि उन पर पुन: अध्ययन किया जाए और मौलाना को उनका सही मुक़ाम दिया जाए। बशुक्रिया-मुस्लिम ऑफ इंडिया

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