शिया-सुन्नी के बीच वर्चस्व हासिल करने लड़ाई की जंग

शिया-सुन्नी के बीच वर्चस्व हासिल करने लड़ाई की जंग

मोहम्मद आमिल, आगरा (टाइम्स ऑफ़ मुस्लिम)
सऊदी अरब में शिया धर्मगुरु शेख निम्र अल निम्र और 46 अन्य लोगों को फांसी दिए जाने के बाद मुस्लिम दुनिया शिया-सुन्नी के बीच टकराव के मुकाम पर आ खड़ी हुई है. 2 जनवरी, 2016 को सऊदी अरब ने विभिन्न अपराधों के 47 आरोपियों को मौत की सजा दी.

देखा जाए तो पिछले साढ़े तीन दशकों में यह पहली बार है जब सऊदी अरब में इतने बड़े पैमाने पर मौत की सजा दी गई है. सजाएं अलग-अलग तरीके से दी गईं. निम्र को मौत की सजा के बाद ईरान में सऊदी अरब के दूतावास पर भी हमला हुआ और उसे आग के हवाले कर दिया गया. इसके चलते पहले से जारी तनाव में और इजाफा हुआ.

इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद के देहांत के बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर हुए विवाद के बाद बंट गया था समुदाय

दिन-ब-दिन दोनों देशों के राजनायिक संबंध और भी बुरे होते जा रहे हैं. उधर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनई ने सऊदी अरब की इस कार्रवाई पर कड़ा ऐतराज़ जताया है और कहा है कि सऊदी राजशाही को एक बेगुनाह के कत्ल का अंजाम भुगतना पड़ेगा. उन्होंने यह भी कहा कि सऊदी को जल्द ही खुदा के कहर का सामना करना पड़ेगा.

दूसरी तऱफ सऊदी अरब ने ईरानी राजनयिकों को 48 घंटे के भीतर देश छोड़ देने फरमान जारी कर दिया. गौरतलब है कि शिया मौलाना अल निम्र सऊदी राजशाही के मुखर आलोचक थे. उन्होंने 2011 में, सऊदी राजशाही के खिलाफ प्रदर्शन का खुलेआम सर्मथन किया था. यह प्रदर्शन शिया युवाओं ने अरब स्प्रिंग के प्रभाव में आकर किया था.

इसके अलावा भी निम्र पर सऊदी राजशाही के खिलाफ लोगों को भड़काने और उसके विरोध में माहौल तैयार करने का आरोप था.ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच के रिश्ते इतने खराब हुए है.

दोनों देशों के कड़वे रिश्ते का इतिहास काफी पुराना है. उसके मूल में अरब क्षेत्रों मे शिया और सुन्नी के बीच वर्चस्व हासिल करने लड़ाई तो रही ही है. लेकिन इसके अलावा उसकी जड़ में आर्थिक साम्राज्य का खेल भी छिपा है.

क्या है शिया सुन्नी-विवाद की जड़?
इस्लाम धर्म के पैगंबर मोहम्मद साहब की वफात 632 ई० में हुई. उनके बाद ही उनके अनुयाईयों के बीच आपस में असहमति का स्वर उभरने लगा. इसकी बड़ी वजह पैगंबर मोहम्मद साहब द्वारा अपने वफात से पहले अपने किसी उत्तराधिकारी का ऐलान नहीं करना था. नतीजतन उसके बाद मुस्लिमों में, उम्मत की अगुवाई के सवाल पर बहस खड़ी हो गई.

इस्लाम के कुछ अनुयाइयों का मानना था कि अगला खलीफा आपसी सहमति से तय करना चाहिए. वहीं दूसरी तरफ़ कुछ अनुयाइयों ने मांग की कि उनके बाद खलीफा मोहम्मद साहब के वंश से चुना जाए. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

शिया धर्मगुरु निम्र पर सऊदी राजशाही के खिलाफ लोगों को भड़काने का आरोप था

उस समय अनुयाइयों का तबका हजरत अली का नाम लेकर आगे आया. हजरत अली पैगम्बर साहब के चचेरे भाई और दामाद थे. लेकिन वहीं दूसरे तबके का मानना था कि हुजूर की सारी निशानदेही हजरत अबु बकर की तरफ जाती है इसलिए उन्हें ही खिलाफत दी जानी चाहिए. ऐसा ही हुआ.

उसके बाद हजरत अली के समर्थकों को शिया कहा जाने लगा. वहीं दूसरे पक्ष के लोगों को सुन्नी. मुस्लिम आबादी में बहुसंख्यक सुन्नी हैं. अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, इनकी संख्या 85 से 90 प्रतिशत के बीच है. दोनों समुदाय के लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं और उनके अधिकांश धार्मिक आस्थाएं और रीति रिवाज एक जैसे हैं. समाजिक स्तर पर इनका आपस मे कोई बैर नहीं है.

भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में शिया और सुन्नी समुदाय के बीच निकाह आम बात है

भारत, पाकिस्तान और इराक जैसे देशों में सुन्नी और शियाओं के बीच शादी बहुत आम बात है. इन दोनों समुदाय का मुख्य टकराव अरब क्षेत्र में राजनैतिक और आर्थिक प्रभुत्व का ही है. वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति से उग्र शिया इस्लामी एजेंडे की शुरुआत हुई.

अरब देशों ने इसे सुन्नी सरकारों के लिए खतरे और चुनौती के रूप में देखा. ईरान ने अपनी सीमाओं के बाहर शिया लड़ाकों और पार्टियों को समर्थन दिया जिसे अरब के देशों ने चुनौती के रूप में लिया.

अरब देशों ने भी सुन्नी संगठनों को इसी तरह मजबूत किया जिससे सुन्नी सरकारों और विदेशों में सुन्नी आंदोलन से उनसे संपर्क और मजबूत हुए. शिया सुन्नी आपसी प्रतिद्वंद्विता के केन्द्र बिन्दु ईरान और सऊदी अरब बने. इनके बीच  632 ई. से उपजा वाद-विवाद बदस्तूर जारी है.

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