बह रही हैं निर्दोष मुसलमानों के खून की नदियां, उन्हें मूली और गाजर की तरह काटा जा रहा है

बह रही हैं निर्दोष मुसलमानों के खून की नदियां, उन्हें मूली और गाजर की तरह काटा जा रहा है

मुददस्सीर अहमद क़ासमी
इस समय विश्व भर मैं मुस्लमान चिंता और पीड़ा की एक अजीब सी स्थिति से जूझ रहे हैं, क्योंकि उनकी नज़रों के सामने निर्दोष मुसलमानों के खून की नदियां बह रही हैं, उन्हें मूली और गाजर की तरह काटा जा रहा है। कहीं उनके मकानों को बम्बारी द्वारा गिराया जा रहा है तो कहीं जला दिया जा रहा है और हद तो यह है कि उन्हें जन्म भूमि को छोड़ने पर भी मजबूर किया जा रहा है। इस समय विशेष रूप से सीरिया और बर्मा के मुसलमान ज़ालिमों के चंगुल से दबोचे जा रहे हैं। एक ओर शाम का ऐतिहासिक शहर अलेप्पो (हलब) लहूलुहान है, मलबे तले दबी मासूम बच्चों की लाशें देखकर कलेजा मुंह को आता है, हकीकत यह है कि वहाँ के बेगुनाहों के दर्द और तकलीफ को सुनने के लिए भी बड़ा दिल गुर्दा चाहिए, वहीं बर्मा मैं मुसलमानों का नरसंहार और उनपर जुल्म इतिहास का दुखद अध्याय बनता जा रहा है, जिससे वहां के मुसलमान सिर छिपाने के लिए झोंपड़ी और भोजन के लिए दाने दाने का मोहताज हो चुके हैं।
अफ़सोस यह है कि सीरियाई और रूसी सेनाएं हलब में जीत हासिल करने की आड़ में निहत्थे नागरिकों की हत्या कर रही हीं। मालूम रहे कि जहां कई वर्षों से जारी सत्ता और साम्प्रदायिक युद्ध में अब तक 4 लाख से अधिक सीरियाई मुस्लिम क़तल कर दिए गए हैं, वहीँ अब हलब शहर में लगातार बमबारी और गोलीबारी करके मुसलमानों की महानता के गवाह इस शहर को बर्बाद  करके मानवता का मजाक उड़ाया जा रहा है, यही कारण है कि ब्रिटिश अखबार 'द गार्जियन' ने हलब की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए हलब को "सबसे बड़ा सामूहिक कब्रिस्तान" करार दिया है।

आइए सीरिया की भीषण कथा वहीँ के एक २८ वर्षीय आदमी  से सुनते हैं जो तुर्की की सीमा पर स्थापित राहत शिविर में अपनी दुखद कहानी यूं बयान करता है: "देखो! मेरा मासूम बेटा और मेरी दो साल की बेटी कैसे डर के एक दूसरे से लिपटे हुए हैं। उनकी नज़रों के सामने दस बच्चों को जिंदा जला दिया गया है। अब यह ज़लियम मेरे बच्चों की ओर बढ़ रहे हैं। कोई तो रोको उन्हें। अल्लाह का क्रोध उतरे गा तुम पर। वह कैसे फरियाद कर रहे हैं, बाबा हमें बचा लो, यह दृश्य मेरे सामने से हटता क्यों नहीं। और मेरे सामने ही मेरे दोनों बच्चों को जिंदा जला दिया गया। उनके शरीर एक दूसरे से चिपके हुए थे। वह अभी तो मेरे सामने खेल रहे थे। क्यों बच गया मैं। मेरी पत्नी को मेरे सामने ज़बह कर दिया गया। अपने बच्चों को अपने सामने जलता देखकर वैसे भी वह जिंदा कब रही थी। किसी को नहीं छोड़ा अत्याचारियों ने।"
मुददस्सीर अहमद क़ासमी

यह तो थी सीरिया के मुसलमानों की बर्बादी की एक झलक। आइए अब बर्मा के मुसलमानों की दुर्दशा का समीक्षा लें। इतिहास का यह भी एक बदतरीन विडंबना है कि बर्मा में सदीं से शांतिपूर्ण जीवन बिता रहे मुसलमानों को पिछले कई सालों से बुद्धिस्ट आतंकवादियों ने सरकार के समर्थन में भयानक ज़ुल्म का निशाना बना रखा है जिसके परिणामस्वरूप अब तक हज़ारों निर्दोष मुसलमान मौत की नींद सोला दिये गए हैं, लाखों दरबदर कर दिए गए हैं और हजारों भयभीत लोग अपने मंज़िल से अनजान होकर अपने आप को समुद्र के हवाले कर रहे हैं। हद तो यह है कि हाल के दंगों में बौद्धों ने पुलिस और अधिकारियों की मौजूदगी में मुसलमानों को जिंदा जलाने, उनके घरों को जलाने यहाँ तक कि मस्जिदों को भी फूंक डालने का काम किया है और अब तक आग और खून का यह खेल जारी है। इन घटनाओं का बेहद शर्मनाक पहलू यह है कि आतंकवादी द्वारा यह अत्याचार पुलिस प्रशासन के आंखों के सामने और म्यांमार सरकार के संरक्षण में हो रहे हैं, मयानमार में वर्तमान स्थिति यह है कि वहां जो मौजूद मुसलमान हैं वे अत्यंत मनोवैज्ञानिक डर और दबाव के आलम में रह रहे हैं।

राखेने परियोजना पर काम करने वाली मानवाधिकार की एक ब्रिटिश संगठन ने अखबार 'द गार्जियन' से बातचीत करते हुए कहा है कि बांग्लादेश और म्यांमार के सरहदी क्षेत्रों के सर्वेक्षण पुष्टि करते हैं कि रोहंगिया मुसलमान अमानवीय अत्याचार का शिकार होकर शरण की मांग में भटक रहे हीं। सितम पर सितम ये कि तथ्य दुनिया के सामने मौजूद रहते हुए भी एक तरफ लगातार मुसलमानों पर भूमि तंग किया जा रहा है और दूसरी ओर ऐसा लगता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाली सभी ताकतों ने चुप रहने का उपवास रख लिया है, या उनके पास आतंकवाद की परिभाषा में कोई भी ज़ुल्म उसी वक़्त दाखिल होगा जब ज़ालिम किसी विशेष समुदाय से ही ताल्लुक रखते हों।

सीरिया और बर्मा के बहुत ही खराब हालात के पश्चात् संयुक्त राष्ट्र और ह्यूमन राइट्स वॉच की कार करदगी पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक प्रक्रिया है क्योंकि यह संस्थाएं इन जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए ही बनाए गए थे। इसी वजह से यह मांग भी जोर पकड़ता जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र और ह्यूमन राइट्स वॉच अपने दायित्वों को निभाते हुए पीड़ितों की मदद करें और सच्चाई को सामने लाएं। विश्व शक्तियों को यह समझ लेना चाहिए कि मुसलमानों के खून से रंगीन हाथों का न्याय के ज़नजीरसे मुक्त रहना पीड़ितों के घाव पर नमक छिड़कने के बराबर है। इसीलिए न्यायपूर्ण दुनिया की यह मांग है कि न्याय की आवश्यकता को पूरा करते हुए सीरिया और बर्मा के मुसलमानों का पुनर्वास सुनिश्चित बनाया जाए तथा अदालत द्वारा अपराधी की सजा को सुनिश्चित किया जाए।

मौजूदा हालात को सामने रखते होए मुस्लिम देशों, मुसलमानों और विशेष रूप से "ओ आई सी" की बेहिसी अफसोसजनक है। वक़्त आ गया है कि अपने अपने हितों के लिये जी रहे मुस्लिम देश लापरवाही के सपने से जाग जाएं और म्यांमार और सीरिया में बेगुनाह मुसलमानों के नरसंहार बंद कराने के लिए भर पुर योगदान दें, नहीं तो आने वाले समय में एक के बाद एक तबाही इनका भाग्य बन जाएगी। समय की पुकार सुनते हुए सभी मुस्लिम देश और विश्व शक्तियाँ मुश्किल की इस घड़ी में अपनी पहचान और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे मुसलमानों की सहायता के लिए उदारता से आगे बढ़ें और उनके पुनर्वास के लिए काम करें ताकि यह फिर अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इन परिस्थितियों में आम मुसलमानों की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने मुल्की कानूनों के दायरे में रहते हुए पीड़ितों के पक्ष में आवाज बुलंद करें और उनके जान-माल, इज़्ज़त व आबरू की सुरक्षा के लिए दुआएं करें।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा हालात मैं समाज दुश्मन तत्वों ने सोशल नेटवर्किंग साइटों को भावनाओं को उत्तेजित करने का एक बड़ा माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जो बेहद चिंताजनक बात है और उसका बड़ा उद्देश्य मुसलमानों की भावनाओं को भड़का ना है, जो तथ्य हैं उसे पेश करना और लोगों को इससे परिचित कराना एक अच्छी बात है लेकिन बे मूल बातें फैलाना एक भ्रामक प्रक्रिया है, होता यह है कि अप्रासंगिक तस्वीरें को पोस्ट करके वा वाही लूटने के लिए सीधे-सादे मुसलमानों को बेवकूफ बनाया जाता है, इसी वजह से इसके प्रति भी सावधान रहने की जरूरत है।

सारांश यह है कि ऐसे हालात में जब विशेष रूप से इस्लामी देशों को सांप्रदायिक हिंसा और मुसलमानों को देशी हिंसा की आग में डाला जा रहा है, मुस्लिम नेताओं, देशों और सभी न्याय शक्तियों की जिम्मेदारी है कि शांति के गठन में वह अपनी भूमिका निभाएं क्योंकि अगर शाम, बर्मा, इराक और फिलिस्तीन समस्याओं का त्वरित समाधान न निकाला गया तो दुनिया भर में उग्रवाद, आतंकवाद और साम्प्रदायिक हिंसा को बल मिलेगा और अंततः दुनिया को नरक बनने से रोक पाने में हम असफल हो जाएं करेंगे।


(लेखक मरकज़ुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेण्टर मुम्बई मैं लेक्चरर और ‘ईस्टर्न क्रिसेंट’ मैगज़ीन के असिस्टेंट एडिटर हैं। लेखक के विचार पूर्णत: निजी हैं, timesofmuslim.com इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी timesofmuslim.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  timesofmuslim@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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TIMES OF MUSLIM: बह रही हैं निर्दोष मुसलमानों के खून की नदियां, उन्हें मूली और गाजर की तरह काटा जा रहा है
बह रही हैं निर्दोष मुसलमानों के खून की नदियां, उन्हें मूली और गाजर की तरह काटा जा रहा है
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